राजा ज्ञानसेन के दरबार में प्रायः शास्त्रार्थ हुआ करता था| जो विजयी होता ज्ञानसेन उसे धन और मान से उपकृत करते| एक दिन ज्ञानसेन के दरबार में शास्त्रार्थ चल रहा था| उस शास्त्रार्थ में विद्यवानभारवि विजेता घोषित किये गए| ज्ञानसेन ने उन्हें हाथी पर बिठाया और स्वयं चँवर डुलाते हुए उनके घर तक ले गए| भारवि जब ऐसे बड़े सम्मान के साथ घर पहुँचे तो उनके माता – पिता की ख़ुशी का ठिकाना न रहा|
घर लौट कर भारवि ने सर्व प्रथम अपनी माता को प्रणाम किया किन्तु पिता की ओर उपेक्षा भरा अभिवादन मात्र किया| माता को यह उचित नहीं लगा| उन्होंने भारवि को साष्टांग दंडवत के लिए इशारा किया| तो उन्होंने बड़े बेमन से इसका निर्वाह किया| पिता ने भी बेमन से चिरंजीवी रहो कह दिया| बात समाप्त हो गयी लेकिन माँ – बाप खिन्न बने रह गए| उन्हें वैसी प्रसन्नता नहीं थी जैसी होनी चहिए थी| कारण भी स्पष्ट था| किसी भी बड़ी उपलब्धि को अर्जित करने पर संतान जिस विनम्रता के भाव से माता पिता को नमन करती है उसका भारवि में सर्वथा अभाव था| उन्हें तो राजा के द्वारा हाथी पर बिठाकर चंवर डुलाते हुए घर तक लाने का अहंकार था| इस अहंकार में उन्होंने शिष्टाचार और विनम्रता को भुला दिया| थोड़े दिनों तक माता पिता की खिन्नता देखने के बाद भारवि माता से कारन पूछने गये| माता बोली विजय होकर लौटने के पीछे तुम्हारे पिता की कठोर साधना [...]
हम में से अधिकतर लोगों के साथ यही समस्या है | जेब में नब्बे रूपये हैं, तो उसका फायदा नहीं उठाएंगे | बस इसी प्रयास में लगे रहेंगे कि दस रूपये और मिल जाँय और पूरे सौ हो जाए | नब्बे रूपये का सुख नहीं भोगेंगे | दस रूपये का दुःख भोगेंगे | हम कभी अपने से छोटों को देखकर नहीं जीते हैं | हम सभी कम्पटीशन में जी रहें हैं, इसीलिए दुखी हैं | अगर पडौसी के घर में कार हो और हमारे घर में नहीं तो यह हमारे लिए सीधी चुनौती हो जाती है | इसलिए, जीवन में इतने दुःख , इतना संघर्ष और इतनी पीडाएं हैं | क्योंकि जीवन में केवल वही सुखी है जो दुःख में भी सुख खोजकर जीना जानता है|
एक बार की बात है – एक महात्मा के पास एक आदमी और उसकी पत्नी पहुंचे | बड़े परेशान, से और बुझे -बुझे से लग रहे थे | महात्मा जी ने उनसे उनकी परेशानी का कारण पुछा तो वे बोले मैं बहुत परेशान हूँ | मुझे बिजनेस में एक लाख का घाटा हुआ है | मन बड़ा बैचैन हो गया है | उसके पीछे उसकी पत्नी बैठी थी | वह धीरे से, मुस्करायी और बोली महाराज मेरे पति झूठ बोल रहे हैं | इनकी बातों में मत आना, इन्हें कोई घाटा नही हुआ | महात्मा ने कहा आखिर सच्चाई क्या है | तुम कहते हो घाटा , पत्नी कहती है कोई घाटा नही , सही क्या है ? वह आदमी बोला , मेरी पत्नी नही [...]
एक भिखारी भूख – प्यास से त्रस्त होकर आत्महत्या की योजना बना रहा था , तभी वहां से एक नेत्रहीन महात्मा गुजरे | भिखारी ने उन्हें अपने मन की व्यथा सुनाई और कहा , ” मैं अपनी गरीबी से तंग आकर आत्महत्या करना चाहता हूँ |” उसकी बात सुन महात्मा हँसे और बोले , “ठीक है, आत्महत्या करो लेकिन पहले अपनी एक आंख मुझे दे दो | मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी चोंका | उसने कहा , “आप कैसी बात करते हैं | मैं आंख कैसे दे सकता हूँ |”
महात्मा बोले, “आंख न सही , एक हाथ ही दे दो , मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी असमंजस में पड़ गया | महात्मा मुस्कराते हुए बोले, संसार में सबसे बड़ा धन निरोगी काया है | तुम्हारे हाथ-पाव ठीक है, शारीर स्वस्थ है, तुमसे बड़ा धनी और कौन हो सकता है | तुमसे गरीब तो में हूँ कि मेरी आँखें नहीं हैं मगर में तो कभी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचता | भिखारी ने उनसे छमा मांगी और संकल्प किया कि वह कोई काम करके जीवन-यापन करेगा |
Be the first to like.
Like
Unlike
“आप माला के दाने बाहर की ओर फेरते है और हम अन्दर की ओर| बताइए इन दोनों में से कौन का तरीका श्रेष्ट है ? ” पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह ने सिख साम्राज्य के विदेश मंत्री फकीर अजीदुद्दीन से पूछा|
फकीर ने बड़ी बुद्धिमतापूर्वक इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में दिया – “महाराज | मुस्लमान माला के दाने बाहर की ओर फेरकर दोष निकलने का प्रयास करते है, जबकि हिन्दू अन्दर की ओर फेरकर गुण ग्रहण करने का यत्न करते है | ”
प्रसन्न होकर महाराज ने उनकी प्रशंसा भरे दरबार में की|
1 person likes this post.
Like
Unlike
इन्सान को अंत तक बोध नहीं हो पाता की क्यों वे इस धरती में जन्मे है व क्या उन्हें करना है ? मखौल में ही जिंदगी काट देते है | एक साधू तीर्थ यात्रा पर निकले | मार्ग – व्यय के लिए किसी सेठ से कुछ माँगा , तो उसने कुछ दिया तो नहीं , पर अपना एक काम भी सौप दिया |
एक बड़ा दर्पण हाथ में थमाते हुए कहा – ” प्रवास काल में जो सबसे बड़ा मुर्ख आपको मिले उसे दे देना | ” संत बिना रुष्ट हुए उसका काम कर देने का वचन देकर दर्पण साथ में ले गए | बहुत दिन बाद वापस लौटे, तो सेठ को बीमार पड़े पाए | संगृहीत धन से वे न अपना इलाज करा पाए और न किसी सत्कर्म में लगा पाए | मरनासन स्तिथि में सम्बन्धी , कुटुम्बी उसका धन , माल उठा – उठाकर ले जा रहे थे | सेठजी को मृत्यु और लूट का दुहरा कष्ट हो रहा था | साधू ने सारी स्तिथि समझी और दर्पण उन्ही को वापिस लौटा दिया | कहा – ” आप ही इस बीच सबसे बड़े मुर्ख मिले , जिसने कमाया तो बहुत , पर सदुपयोग करने का विचार तक नहीं उठा | “
Be the first to like.
Like
Unlike
भगवान ने सृष्टि की रचना की | इसके बाद सृष्टि में सभी के गुजारे के लिए क्या -क्या चाहिए , वह देने का कार्य शुरू किया | किसी को आयुष्य चाहिए था तो किसी को धन -संपत्ति ,किसी को बल, किसी को विद्या | भगवान से जिसने जो माँगा , प्रभु ने कृपा कर उसे वही प्रदान किया | भगवान के पास जिसने जो देखा उसमें से सबने अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार उसे मांग लिया | इस वितरण कार्य में भगवान ने किसी प्रकार की कृपणता नहीं की |
वितरण का कार्य चल ही रहा था कि भगवान के हाथ से शांति गिरकर जमीन पर आ गिरी | भगवान ने उसे अपने पैरों के नीचे दबा लिया |किसी ने भगवान के उस कार्य को नहीं देखा | लेकिन लक्ष्मी जी की नजर से यह घटना नहीं बची | सभी लोग भगवान के पास से अपनी इच्छित सामग्री लेकर चले गए | उसके बाद प्रभु ने पैर के नीचे दबी ” शांति ” को उठाकर अपने पास रख लिया | इस पर लक्ष्मी जी ने भगवान से पूछा – प्रभो ! आपने ऐसा क्यों किया ? भगवान ने उत्तर दिया – देवी ! सारे मनुष्य अपनी -अपनी इच्छित सामग्री लेकर यहाँ से चले गए हैं | अब उन्हें मेरी आवश्यकता नहीं रह गयी है | उनके पास सब कुछ है लेकिन शांति नहीं है | शांति के लिए उन्हें मेरे पास आना होगा| भोग और अशांति से जब वे ऊब जायेंगे , तब उन्हें उसकी तलाश करनी [...]
खुशी का कोई फार्मूला नही होता | यदि फार्मूला होता तो खुशी भी बाजार में बिकती और दुनिया के तमाम धनवान खुश नजर आते | किन्तु ऐसा संभव नही है | भूल जाना जरूरी है किन्तु हम भूलना पसंद नहीं करते | वही सब कुछ बेवजह याद करते रहते हैं जो भुला दिया जाना चाहिए था | दौलत की तरह खुशियाँ नहीं बंटती जब कि खुशियाँ बंटनी चाहिए | दुर्भाग्य यह है कि परिवार बंट रहे हैं , समाज बंट रहा है और तो और देश भी बाँटने के षड्यंत्र रचे जा रहें हैं |
जीवन में सफलता एक दिन का चमत्कार नही है | कठोर परिश्रम और मेहनत ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है | अगर हम यह समझ लें कि हमें जो कुछ भी मिला है , वह ईश्वर की कृपा है तो जीवन जीना आसान हो जायेगा | विनयशीलता और दूसरों का आदर हमेशा बड़ा बनाते हैं | सबसे जरूरी है , छोटे – छोटे सुखों में अपनी खुशी तलाशना | हमें चाहिए कि सीमाओं के भीतर सादा जीवन जियें , अपनी पूंजी बांटे , खुशियाँ बाँटें | खुशी अपने भीतर होती है , उसे पहचानने की जरूरत है | सुख का सभी इन्तजार करते हैं लेकिन यह भी याद रखना जरूरी है कि सुख कभी अकेला नही आता | वह अपने साथ – साथ संताप , दुखः , पीड़ा , कुंठा और भय भी लिए आता है | अतः हर पल को जीना सीखना जरूरी है | जिस तरह हम खुशियों के लिए बाँहें [...]
एक राजहंस था | वह अपने बंधु – मित्रों से मिलने दूर देश गया था | बहुत दिन हो गए तो वहां से लौटने लगा | लम्बी यात्रा के कारण वह बहुत थक गया था | एक जगह उसे एक सुन्दर बगीचा नजर आया | वह विश्राम करने के लिए वहीँ रूक गया | उसी समय उस उद्यान में राजकुमार भी भ्रमण करने आया हुआ था | राजकुमार राजहंस की सुन्दरता पर मुग्ध हो गया | उसने हंस को वहीँ ठहरने को कहा | हंस ने उसकी बात मान ली | वह राजकुमार के साथ हाथी पर बैठकर सैर करता , मौज करता , मोती चुगता , बहुत प्रसन्न रहता | उसी उद्यान में एक पेड़ पर कौआ रहता था | उसे राजहंस और राजकुमार की मित्रता पर बहुत ईर्ष्या होती | वह भी उन दोनों का धर्म-भाई बन गया | अब कौआ भी हौद में बैठकर हाथी पर सैर करता और फल -फूल खाकर मौज करता |
कुछ दिन इसी तरह बीते | हंस को अपने घरवालों की याद सताने लगी | वह राजकुमार से विदा लेकर उड़ने लगा तभी कौआ बोला – ” भाई ! रस्ते में एक दिन के लिए मेरे घर भी ठहरो | ” हंस ने कहा -” ठीक है भाई ! तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ | जहाँ तुम्हारा घर आ जाये , मुझे बता देना | ” धूर्त कौआ हंस की पीठ पर बैठ कर उड़ते हुए हंस के पंख कुतरने लगा | कौए का घर आते ही हंस नीचे उतरा और अपनी [...]
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने कलियुग में भवभाधाओं से छुटकारा पाने के लिए बहुत ही सरल उपाय बताया है और वह है — नाम – जाप | उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा –
” कलियुग केवल नाम आधारा , सुमिर – सुमिर नर उतरहिं पारा | “
चूंकि इस युग में मनुष्य झंझटों में इस प्रकार फँस गया है कि उसके लिए तप , हवन , साधना ,ध्यान व् अन्य कठोर उपायों का निर्वाह करना मुश्किल हो गया है | अतः जब भी , जहां भी , जिस भी अवस्था में आप प्रभु का सुमिरन (जाप ) कर लें तो दीनबंधु – दीनानाथ , करुनानिधान – स्वामी अपने भक्तों की प्रार्थना पर अवश्य ही ध्यान देते हैं | नाम – जाप भी यदि सत्संग के माध्यम से किया जाय तो मन लगता है | क्योंकि मन चंचल है , क्षण में इधर तो क्षण में उधर | इसकी प्रकृति ही कुछ विचित्र है | यह मोह – माया में उलझते देर नही लगाता | मनुष्य को इस कदर भरमा देता है कि वह क्या करे और क्या नही करे की स्थति में पहुँच जाता है |
एक बार भगवान् श्री कृष्ण के परम मित्र उद्धव ने भी मोह – माया से छुटकारा पाने के लिए प्रभु से अनुनय – विनय की थी | जिस समय उद्धव सखियों के प्रेम के आगे पराजित होकर प्रभु श्री कृष्ण के पास पहुंचा तो ” बाँसुरी ” से धुआं [...]
महाराज भर्तहरी ने गुरू के कहने पर राजपाट त्याग दिया और भगवा वस्त्र पहनकर साधू बन गए | इतना करके भी वे मन की इच्छाओं को नही त्याग पाए |
एक दिन भर्तहरी ने एक हलवाई को गरम – गरम जलेबियाँ बनाते देखा | भर्तहरी का मन बेकाबू हो गया | पैसा उनके पास था नही | किसी प्रकार अचकचाते हुए हलवाई से बोले -भाई मेरा मन जलेबी खाने का कर रहा है | क्या थोड़ी सी जलेबी दोगे ? हलवाई समझ गया कि यह किसी संपन्न घर का है | सब त्याग कर भी इच्छाओं का दमन नही कर पा रहा है | बोला – महाराज , जलेबी खानी है तो पैसे दो या फिर कुछ काम करो | मेरी दुकान में कुछ कोयले पड़े हैं | उन्हें तोड़ दो | मेहनताने के पैसे से जलेबी खा लेना |
भर्तहरी जलेबी खाने को इतने आतुर थे कि विवश होकर कोयले तोड़ने लगे | हाथों में चाले पड़ गए | काम हो गया , तो हलवाई ने मेहनताना दे दिया | साधू बने भर्तहरी ने गरमागरम जलेबियाँ लीं और प्रसन्न हो खाने को तैयार हो गए | तभी सोचने लगे – ” भरे बाजार में खाऊंगा तो लोग कहेंगे , यह साधू तो हो गया पर मन की इच्छाओं पर वश नही कर सका | अच्छा यही होगा कि एकांत में जलेबी खाई जाय और स्वाद लिया जाय | भर्तहरी नदी किनारे जा पहुंचे | स्नान किया , संध्या – वंदन किया | स्नान – ध्यान से बुद्धि को बल मिला [...]
क्रोध मनुष्य का सबसे भयंकर शत्रु है |वैसे तो इर्ष्या , द्वेष घृणा आदि सभी बुरे मनोभाव का प्रभाव मनुष्य के स्वास्थ के लिए घातक हुए बिना नहीं रह सकता , पर क्रोध का दुष्प्रभाव अपनी घातकता में सबसे बढ़ा-चढ़ा है | ऐसे में शान्ति बहुत दूर रहती है | यों’ तो क्रोध या गुस्से के बारे में न जानने वाले थोड़े ही लोग होंगे क्यों कि हाट- बाजार , घर ,सभी जगह इसके दर्शन होते रहते हैं |कितने घरो में तो हरदम इसका प्रदर्शन होता रहता है |कहीं माँ गुस्से में बच्चों को पीट रही है ,कहीं पति -पत्नी एक दुसरे पर गुस्सा उतार रहे हैं , कही गुरु अपने शिष्य पर बरस रहे हैं | इस तरह क्रोध एक शासक कि भांति सभी प्राणियों पर शासन करता दिखाई देता है |
क्रोध का बुरा प्रभाव जाने -अनजाने ही हो जाता है | सभी ब्यक्तियों में चाहे वे उच्य पद के अधिकारी ही क्यों न हों , क्रोध थोड़ा होता ही है | हाँ इतना अवश्य है कि क्रोध किसी को कम आता है , किसी को ज्यादा | कई ब्यक्ति स्वभाव में अधिक क्रोधी होते हैं , कोई कम होते हैं | भूख प्यास , निंद्रा आदि जीवन के साथ हैं , पर क्रोध एसी वस्तु नहीं है | क्रोध नियंत्रित किया जा सकता है या छोड़ा जा सकता है | क्रोध करने से मनुष्य अस्वस्थ हो जाता है | गुस्से कि आग मनुष्य के बाहरी भाग को ही नहीं , शरीर के भीतर को जलाती है | यह [...]
राजा की सवारी आकर गंगा के किनारे रुकी , क्योंकि आज गुरू – पूर्णिमा होने के कारण वे गंगा स्नान के लिए आये थे| तभी उनकी नजर एक छोटे से बालक पर पड़ी | जो दूर बैठा मिट्टी से खेलने में व्यस्त था | राजा उस बालक के पीछे आकर बैठ गए | किन्तु उसे कुछ आभास नहीं हुआ | क्योंकि वह अपने खेल में पूर्ण तन्मय था |
उन्होंने ही पहल करते हुए पूछा – ” तुम्हारा नाम क्या है ?
बालक – ” माधो ”
राजा – तुम मट्टी से क्यों खेल रहे हो ?
माधो – क्योंकि यह शरीर मट्टी से बनता है और मट्टी में मिल जाता है | इसलिए इसी से खेल रहा हूँ |
राजा उत्तर सुनकर प्रसन्न हो गए , इसलिए उन्होंने पूछा – मेरे साथ रहोगे ?
माधो – क्यों नहीं ,मेरे लिए इससे बड़ी खुशी की बात क्या हो सकती है , किन्तु मेरी कुछ शर्तें हैं|
राजा ने मुस्कराते हुए पूछा – अपनी शर्तें बेहिचक कहो |
माधो – मैं खाऊंगा , किन्तु आप कुछ नहीं खायेंगे | मैं पहनूंगा किन्तु आप कुछ नहीं पहनेंगे| मैं जहाँ -जहाँ जाऊंगा मेरे साथ चलेंगे | मैं जब सोऊंगा आप सदा जागकर मेरी रक्षा करेंगे |
राजा मन ही मन समझ गए कि यह बालक , बालक नहीं वरन बाल संत है | इसलिए उन्होंने कहा कि जरा आप ही बताइए कि क्या इन शर्तों को मानना संभव है |
माधो मुस्कराते हुए बोला ,हे राजन – बिना सोचे – समझे किसी के सामने कोई प्रस्ताव नहीं रखना [...]
Recent Comments