दुनिया सुखो के पीछे दौड़ रही है| हर कोई सब कुछ पाने की होड़ में लगा है| हम खुद भी ऐसे हैं और बच्चों को भी इसी दौड़ में जुटा दिया है| हर सुख, सारी सुविधा और दुनिया भर का वैभव हर एक की दिली तमन्ना हो गयी है| एक चीज़ का अभाव भी बर्दाशत नहीं है| थोड़ी सी असफलता हमें तोड़ देती है| लेकिन इसके बाद भी जो नहीं मिल पा रहा है वो है आनंद| दरअसल यह आनंद सब कुछ पा लेने में नहीं है| कभी – कभी अभाव में जीना भी आनंद देने लगता है|
अगर आपके अन्दर कोई अभाव है तो उसे सद्गुणों से भरने का प्रयास करें| महत्वाकांक्षाओं को हावी न होने दे| मन चाहा मिल जाए इसके लिये तेज़ी से दौड़ रही है दुनिया| न मिलने का विचार तो लोगो को भीतर तक हिला देता है| संतों ने बार – बार कहा है जो है उसका उपयोग करो और जो नहीं है उसके बारे में सोच – सोच कर तनाव में मत आओ| हम जो नहीं हैं उसे हानि मन कर जो है उसका भी लाभ नहीं उठा पाते हैं| संतो के पास यह कला होती है की वह अभाव का भी आनंद उठा लेते हैं| हमारे लिये दो उदहारण काफी हैं| श्री राम वनवास में पूरी तरह से अभाव में थे| जिनका कल राजतिलक होने वाला था उन्हें चौदह वर्ष वनवास जाना पड़ा| इधर रावण के पास ऐसी सत्ता थी [...]
उन्नीसवी सदी की बात है, एक बार महारानी विक्टोरिया लन्दन में राजनयिक सम्मान समारोह में शामिल थी| समारोह के सम्मानीय अतिथि थे अफ्रीका के शासन प्रमुख| समारोह में करीब ५०० कूटनीतिज्ञ तथा राजशाही परिवार के सदस्य भाग ले रहे थे| सभी एक साथ भोजन करने बेठे| भोजन परोसे जाने के दोरान सब कुछ ठीक रहा लेकिन जब फिंगर बोल (हाथ धोने का पात्र) सभी के सामने रखा गया तो यह कइयो की फजीहत का कारन बन गया| अफ़्रीकी शासन प्रमुख ने इससे पूर्व कभी फिंगर बोल नहीं देखा था| वह परंपरा इंग्लैंड में बहुत प्रसिद्ध थी| अफ़्रीकी राजनयिक को किसी ने इसके बारे में समझाना जरूरी नहीं समझा था|
समारोह में मोजूद सभी विशेष अतिथियों को लगा की उन्हें इसकी जानकारी होगी| उस राजयनिक ने फिंगर बोल को कुछ श्रनों तक देखा तथा उसके बाद उसे अपने दोनों हाथों से पकड़कर उठाया| इससे पहले की कोई उनसे कुछ कह पाता| उन्होंने कटोरे को मुहँ से लगाया और उसमें रखे पानी को एक साँस में पी गए| यह देखकर सभी अति विशिष्ट अतिथि सन्न रह गये| कुछ श्रनों के लिए मेज पर सन्नाटा छाया रहा तथा उसके बाद सभी ने काना फूसी शुरू कर दी| सभी को व्याकुल देख महारानी विक्टोरिया ने भी फिंगर बोल को अपने दोनों हाथों में लिया और उसे मुहँ से लगा कर उसमे पड़े पानी को पी गयीं| महारानी को हाथ धोने वाला पानी पीते देख सभी लोग चकित रह गये [...]
फूलों से तुम हँसना सीखो और भौरों से गाना |
वृक्षों की डाली से सीखो फल आके झुक जाना ||
सूरज की किरणों से सीखो जगना और जगाना |
मेहंदी के पत्तो से सीखो पीसकर रंग चढ़ाना ||
दूध और पानी से सीखो मिलकर प्रेम बढ़ाना |
सुई और धागों से सीखो बिछुड़े हुए मिलाना ||
कोयल से तुम सीखो बच्चो मीठे बचन सुनाना |
मीठे मीठे गीत सुनाकर सबका चित्त लगाना ||
नर तन पाकर के तुम सीखो सुखद समाज बनाना |
दीन दुखी की सेवा में ही अपना चित्त लगाना ||
झूठ कपट को त्यागो बच्चो शत मार्ग पर चलना |
कहें हितैषी सीखो बच्चों इन पद्यों को गाना ||
Source: Unknown
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एक भिखारी भूख – प्यास से त्रस्त होकर आत्महत्या की योजना बना रहा था , तभी वहां से एक नेत्रहीन महात्मा गुजरे | भिखारी ने उन्हें अपने मन की व्यथा सुनाई और कहा , ” मैं अपनी गरीबी से तंग आकर आत्महत्या करना चाहता हूँ |” उसकी बात सुन महात्मा हँसे और बोले , “ठीक है, आत्महत्या करो लेकिन पहले अपनी एक आंख मुझे दे दो | मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी चोंका | उसने कहा , “आप कैसी बात करते हैं | मैं आंख कैसे दे सकता हूँ |”
महात्मा बोले, “आंख न सही , एक हाथ ही दे दो , मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी असमंजस में पड़ गया | महात्मा मुस्कराते हुए बोले, संसार में सबसे बड़ा धन निरोगी काया है | तुम्हारे हाथ-पाव ठीक है, शारीर स्वस्थ है, तुमसे बड़ा धनी और कौन हो सकता है | तुमसे गरीब तो में हूँ कि मेरी आँखें नहीं हैं मगर में तो कभी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचता | भिखारी ने उनसे छमा मांगी और संकल्प किया कि वह कोई काम करके जीवन-यापन करेगा |
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एक संत अपने शिष्यों के साथ तीर्थ यात्रा पर निकले| रस्ते में निर्माणाधीन मंदिर पर कुछ मजदूर कार्य कर रहे थे| स्वामीजी ने एक मजदूर से पूछा – “भाई क्या कर रहे हो?” उसने उत्तर दिया के आपको दिखाई नहीं दे रहा है की हम गधे की तरह मजदूरी कर रहे है| ठेकेदार दम नहीं लेने देता |
दुसरे मजदूर से पूछने पर उसने कहा की महाराज | मंदिर बन रहा है| हमारी किस्मत में तो मजदूरी करनी लिखी है सो कर रहे है| थोड़ी ही दूर पर एक मजदूर सिर पर तगारी लिए चूना-पत्थर दौड-दौड़ कर पंहुचा रहा था| संत नर वही प्रश्न उससे दोहराया| उसने कहा की स्वामीजी हमारे धन्य भाग्य है| गाँव में मंदिर बन रहा है और मुझे भी यहाँ किस्मत से काम मिल गया है| भगवन की सेवा भी हो रही है तथा जीवन बसर भी हो रहा है|
संत ने शिष्यों को समझाया कि एक ही काम को एक व्यक्ति मजबूरी में तथा दूसरा व्यक्ति भाग्य को दोष देता हुआ एवं तीसरा व्यक्ति उत्साह से कर रहा है| यही काम उनकी गुणवत्ता में भी दिखाई देती है|
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