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krishna

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baba ji thara kya kehana (बाबाजी थारा क्या कहना )

Lyrics:

बागो रंग बिरंग , रंग सु हिवडे उठी उमंग |
बाबाजी थारा क्या कहना || |४|
बाबाजी थारा क्या कहना, बाबाजी थारा क्या कहना || |३|
बागो रंग बिरंग , रंग सु हिवडे उठी उमंग |
बाबाजी थारा क्या कहना ||
बागो रंग बिरंग , रंग सु हिवडे उठी उमंग |
बाबाजी थारा क्या कहना ||
सुन्दर सलोनी सूरत,मन में बसा ल्यु मूरत |
छवि मन भा गयी ||
गजरा राणे ने रसीला , नीरस का मन भी डोला |
लगन लगा गयी ||
नैना बरसे प्यार, नैना बरसे प्यार |
प्यार में तन मन से उवाड़ |
बाबाजी थारा क्या कहना ||
बागो रंग बिरंग , रंग सु हिवडे उठी उमंग |
बाबाजी थारा क्या कहना ||
दर्दी को दर्द मिट गो ,ऐसी मस्ती में रंग गो |
बेसून सो हो गयो ||
माथे में चावन लाग्यो , श्याम ने रिझावन लाग्यो |
कमतकार  हो गयो||
ऐसी लागी लगन, लगन में बन्दों हुयो मगन |
बाबाजी थारा क्या कहना ||
बागो रंग बिरंग , रंग सु हिवडे उठी उमंग |
बाबाजी थारा क्या कहना ||
मदन मुरारी थे हो , केसर गिरधारी थे हो  |
भक्ता की शान हो ||
कृष्ण कन्हैया थे हो  , बंसी बजैया थे हो  |
खाटू वाला श्याम हो ||
बागो रंग बिरंग , रंग सु हिवडे उठी उमंग |
बाबाजी थारा क्या कहना ||
बागो रंग बिरंग , रंग सु हिवडे उठी उमंग |
बाबाजी थारा क्या कहना ||
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” बिनु सत्संग विवेक न होई ”

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने कलियुग में भवभाधाओं से छुटकारा पाने के लिए बहुत ही सरल उपाय बताया है और वह है — नाम – जाप | उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा –
” कलियुग केवल नाम आधारा , सुमिर – सुमिर नर उतरहिं पारा | “
चूंकि इस युग में मनुष्य झंझटों में इस प्रकार फँस गया है कि उसके लिए तप , हवन , साधना ,ध्यान व् अन्य कठोर उपायों का निर्वाह करना मुश्किल हो गया है | अतः जब भी , जहां भी , जिस भी अवस्था में आप प्रभु का सुमिरन (जाप ) कर लें तो दीनबंधु – दीनानाथ , करुनानिधान – स्वामी अपने भक्तों की प्रार्थना पर अवश्य ही ध्यान देते हैं | नाम – जाप भी यदि सत्संग के माध्यम से किया जाय तो मन लगता है | क्योंकि मन चंचल है , क्षण में इधर तो क्षण में उधर | इसकी प्रकृति ही कुछ विचित्र है | यह मोह – माया में उलझते देर नही लगाता | मनुष्य को इस कदर भरमा देता है कि वह क्या करे और क्या नही करे की स्थति में पहुँच जाता है |
एक बार भगवान् श्री कृष्ण के परम मित्र उद्धव ने भी मोह – माया से छुटकारा पाने के लिए प्रभु से अनुनय – विनय की थी | जिस समय उद्धव सखियों के प्रेम के आगे पराजित होकर प्रभु श्री कृष्ण के पास पहुंचा तो ” बाँसुरी ” से धुआं [...]

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” श्री कृष्ण और घंटी “

माता यशोदा श्री कृष्ण के मक्खन चुराने की शिकायतें सुन – सुनकर तंग आ गयी थीं | जब गोपियाँ उनकी शिकायत करतीं तो माँ की ममता इस बात से इंकार कर देती | एक दिन यशोदा माँ को श्री कृष्ण की करतूतों को दिखने के लिए एक योजना सभी गोपियों ने मिलकर बनाई | उस दिन सभी ने अपने – अपने घरों में जाकर मक्खन को छत की दीवार से इतनी ऊँचाई पर टांग दिया जिससे श्री कृष्ण उसे छू भी न सकें तथा मक्खन के मटके के ऊपर ही एक घंटी लगा दी, जिससे कृष्ण रंगे हाथ पकडे जा सकें |
गोपियों की योजना के अनुसार ही हुआ | मौका पाकर श्री कृष्ण एक गोपी के घर में अपने बल – सखाओं के साथ पहुंचे | वहाँ पहुंचकर जब मक्खन की हांडी को अधिक ऊँचाई पर देखा तो सारा माजरा उनकी समझ में आ गया | उन्होंने तुरंत अपनी आँख बंद कर हाथों को जोड़ा और बड़े ही प्रेम – भाव से बोले – हे घंटी , जब तक मेरे सभी सखा मक्खन न खालें , तब तक आप मत बजना | फिर क्या था सभी ने एक – दूसरे के ऊपर चढ़कर मक्खन खाया | सभी आनंदित थे | जब सबका पेट भर गया तो श्री कृष्ण जी की बरी आयी | उन्होंने ऊपर जाकर ज्योंही मक्खन मुख में डाला घंटी जोर से टनटना उठी | सभी ग्वाल – बल वहाँ से अपनी जान बचाकर भाग निकले | बस एक कन्हैया ही मटके से लटके रह गए | गोपियाँ [...]

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