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” सावधान आईने को मत तोड़ो! “

एक पागल आदमी था | वो अपने आप को बहुत सुन्दर समझता था | जैसा की सब पागल समझतें हैं की पृथ्वी पर उस जैसा सुन्दर दूसरा कोई नहीं है | यही पागलपन के लक्षण है लेकिन वह आईने के सामने जाने से डरता था, लेकिन जब भी कोई उसके सामने आइना ले आता तो वह आईना फोड़ देता था | लोग पूछते ऐसा क्यों? तो वह कहता में इतना सुन्दर हूँ और आईना कुछ ऐसे गड़बड़ करता है की मुझे कुरूप बना देता है | मैं किसी आईने को नहीं सहूँगा |  वह कभी आईना नहीं देखता |
मनुष्य भी पागल की तरह व्यवहार करता है | वह यह नहीं सोचता की आईना वही तस्वीर दिखाता है, जो मैं हूँ | आईने को मेरा कोई पता तो मालूम नहीं जो वह मुझे बदसूरत बनायेगा | लेकिन बजाये यह देखने की, हम आईना तोड़ने में लग जाते हैं | परेशानियों से दूर भागने वाले लोग उन्ही आईना तोड़ने वाले लोगो की तरह होते हैं | अगर संसार आपको दुःख का कारण लगने लगे, तो याद रखना संसार एक दर्पण से ज्यादा नहीं | अगर कांटें इकट्ठे किये हैं तो दिखाई तो पड़ेंगे | यह दुनिया हमारा ही अक्स है | क्या कभी कोई अपने अक्स को कैद कर पाया है, नहीं ना ? तो आप कैसे कर पायेंगे | अगर परेशानियों से पीछा छुड़वाना है तो खुद को बदलना होगा ना कि आईने को तोड़ना [...]

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” इश्वर की सत्ता “

एक बार काशी नरेश ने अपने गुरु को दरबार में बुलाया और आवभगत करने के बाद कहा ” गुरुदेव एक लम्बे अरसे से मुझे आपके धर्मोपदेश सुनने का सुअवसर प्राप्त होता रहा है| आप इश्वर की सत्ता और उसकी न्याय की बातें बताते रहें हैं | मेरी हार्दिक इच्छा है कि में इश्वर को साक्षात् देखूँ |” गुरु ने उत्तर दिया ” जिस प्रकार आपको अहसास है कि जो कपड़े आपने पहन रखें हैं, वें किसी और के बनाये हुए हैं, उसी प्रकार यह दिन रात, आकाश धरती आदि का बनाने वाला, हजारों प्रकार के जीव जंतुओं का निर्माण करने वाला भी कोई सर्व शक्तिमान है |” धर्मगुरु का उत्तर काशी नरेश को अश्वस्त नहीं कर सका | वह इश्वर का दर्शन करने का आग्रह करते रहे | आखिरकार गुरु ने सम्राट को यह विश्वास दिलाया की वह इसके लिए प्रयत्न करेंगे | दुसरे दिन दोपहर में जब सूर्य तप रहा था गुरु ने सम्राट के महल में जाकर कहा ” आपको शायद याद होगा की कल आपने इश्वर के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी | कृपया मेरे साथ चलिए | सम्राट तुरंत अपने गुरु के साथ बाहर आ गए |
कुछ शरण वे दोनों धुप में चलते रहे | फिर गुरु ने कहा ” सम्राट आकाश में तपते सूर्य की ओर देखें, सीधे सूर्य की ओर | और कहीं ध्यान न दें | यदि आपके मन में कोई गम हो तो उसे भी [...]

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‘ जीवन के चार सच ‘

 
ये हैं जीवन के चार सच:
किसी ने जीवन को सपना कहा है, तो किसी ने पहेली| किसी को लगता है की ज़िन्दगी में जो कुछ भी होना है, सब किस्मत के हाथ में है| दूसरी तरफ वे लोग हैं जो पुरुषार्थ यानि की मेहनत मशक्कत की भूमिका को अहम् मानते हैं|
जहाँ भाग्यवादी ज़िन्दगी की हर घटना के लिए भाग्य को ही ज़िम्मेदार ठहराते हैं, वहीँ कर्मवादियों को मानना है की व्यक्ति खुद ही अपने भाग्य का निर्माण करता है| इन अलग – अलग तरह की बातों को सुनकर एक आम इंसान दुविधा में पड़ जाता है, की आखिर ज़िन्दगी का असल सच क्या है? इसी दुविधा को मिटाने का काम किया है महात्मा बुद्ध ने – जिन्होंने इंसानी ज़िन्दगी के सच से पर्दा उठाते हुए बताया की ज़िन्दगी के चार ही सच हैं, जो की इस प्रकार हैं -
(१) इस संसार में दुःख अनिवार्य है, पूरी तरह से दुखों से मुक्ति संसार में रहते हुए संभव नहीं है|
(२) इस दुःख का एक कारण है, जिसे दूर करने से इन दुखों से छुटकारा पाया जा सकता है|
(३) दुखों का प्रमुख कारण इच्छा या वासनायें ही हैं|
(४) कभी पूरी न होने वाली इन इच्छाओं और वासनाओं को नष्ट करके ही इन दुखों को दूर किया जा सकता है|
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‘ गलती से भी बड़ी गलती है उस पर हँसना ‘

उन्नीसवी सदी की बात है, एक बार महारानी विक्टोरिया लन्दन में राजनयिक सम्मान समारोह में शामिल थी| समारोह के सम्मानीय अतिथि थे अफ्रीका के शासन प्रमुख| समारोह में करीब ५०० कूटनीतिज्ञ तथा राजशाही परिवार के सदस्य भाग ले रहे थे| सभी एक साथ भोजन करने बेठे| भोजन परोसे जाने के दोरान सब कुछ ठीक रहा लेकिन जब फिंगर बोल (हाथ धोने का पात्र) सभी के सामने रखा गया तो यह कइयो की फजीहत का कारन बन गया| अफ़्रीकी शासन प्रमुख ने इससे पूर्व कभी फिंगर बोल नहीं देखा था| वह परंपरा इंग्लैंड में बहुत प्रसिद्ध थी| अफ़्रीकी राजनयिक को किसी ने इसके बारे में समझाना जरूरी नहीं समझा था|
समारोह में मोजूद सभी विशेष अतिथियों को लगा की उन्हें इसकी जानकारी होगी| उस राजयनिक ने फिंगर बोल को कुछ श्रनों तक देखा तथा उसके बाद उसे अपने दोनों हाथों से पकड़कर उठाया| इससे पहले की कोई उनसे कुछ कह पाता| उन्होंने कटोरे को मुहँ से लगाया और उसमें रखे पानी को एक साँस में पी गए| यह देखकर सभी अति विशिष्ट अतिथि सन्न रह गये| कुछ श्रनों के लिए मेज पर सन्नाटा छाया रहा तथा उसके बाद सभी ने काना फूसी शुरू कर दी| सभी को व्याकुल देख महारानी विक्टोरिया ने भी फिंगर बोल को अपने दोनों हाथों में लिया और उसे मुहँ से लगा कर उसमे पड़े पानी को पी गयीं| महारानी को हाथ धोने वाला पानी पीते देख सभी लोग चकित रह गये [...]

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‘ नब्बे नहीं पूरे सौ चाहिए ‘

हम में से अधिकतर लोगों के साथ यही समस्या है | जेब में नब्बे रूपये हैं, तो उसका फायदा नहीं उठाएंगे | बस इसी प्रयास में लगे रहेंगे कि दस रूपये और मिल जाँय और पूरे सौ हो जाए | नब्बे रूपये का सुख नहीं भोगेंगे | दस रूपये का दुःख भोगेंगे | हम कभी अपने से छोटों को देखकर नहीं जीते हैं | हम सभी कम्पटीशन में जी रहें हैं, इसीलिए दुखी हैं | अगर पडौसी के घर में कार हो और हमारे घर में नहीं तो यह हमारे लिए सीधी चुनौती हो जाती है | इसलिए, जीवन में इतने दुःख , इतना संघर्ष और इतनी पीडाएं हैं | क्योंकि जीवन में केवल वही सुखी है जो दुःख में भी सुख खोजकर जीना जानता है|
एक बार की बात है – एक महात्मा के पास एक आदमी और उसकी पत्नी पहुंचे | बड़े परेशान, से और बुझे -बुझे से लग रहे थे | महात्मा जी ने उनसे उनकी परेशानी का कारण पुछा तो वे बोले मैं बहुत परेशान हूँ | मुझे बिजनेस में एक लाख का घाटा हुआ है | मन बड़ा बैचैन हो गया है | उसके पीछे उसकी पत्नी बैठी थी | वह धीरे से, मुस्करायी और बोली महाराज मेरे पति झूठ बोल रहे हैं | इनकी बातों में मत आना, इन्हें कोई घाटा नही हुआ | महात्मा ने कहा आखिर सच्चाई क्या है | तुम कहते हो घाटा , पत्नी कहती है कोई घाटा नही , सही क्या है ? वह आदमी बोला , मेरी पत्नी नही [...]

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सबसे बड़ा धन

एक भिखारी भूख – प्यास से त्रस्त होकर आत्महत्या की योजना बना रहा था , तभी वहां से एक नेत्रहीन महात्मा गुजरे | भिखारी ने उन्हें अपने मन की व्यथा सुनाई और कहा , ” मैं अपनी गरीबी से तंग आकर आत्महत्या करना चाहता हूँ |” उसकी बात सुन महात्मा हँसे और बोले , “ठीक है, आत्महत्या करो लेकिन पहले अपनी एक आंख मुझे दे दो | मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी चोंका | उसने कहा , “आप कैसी बात करते हैं | मैं आंख कैसे दे सकता हूँ |”
महात्मा बोले, “आंख न सही , एक हाथ ही दे दो , मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी असमंजस में पड़ गया | महात्मा मुस्कराते हुए बोले, संसार में सबसे बड़ा धन निरोगी काया है | तुम्हारे हाथ-पाव ठीक है, शारीर स्वस्थ है, तुमसे बड़ा धनी और कौन हो सकता है | तुमसे गरीब तो में हूँ कि मेरी आँखें नहीं हैं मगर में तो कभी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचता | भिखारी ने उनसे छमा मांगी और संकल्प किया कि वह कोई काम करके जीवन-यापन करेगा |
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प्रशंसा

“आप माला के दाने बाहर की ओर फेरते है और हम अन्दर की ओर| बताइए इन दोनों में से कौन का तरीका श्रेष्ट है ? ” पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह ने सिख साम्राज्य के विदेश मंत्री फकीर अजीदुद्दीन से पूछा|
फकीर ने बड़ी बुद्धिमतापूर्वक इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में दिया – “महाराज | मुस्लमान माला के दाने बाहर की ओर फेरकर दोष निकलने का प्रयास करते है, जबकि हिन्दू अन्दर की ओर फेरकर गुण ग्रहण करने का यत्न करते है | ”
प्रसन्न होकर महाराज ने उनकी प्रशंसा भरे दरबार में की|
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“प्रार्थना की शक्ति”

भगवान् श्री कृष्ण का एक अनन्य भक्त था | वह बृन्दावन में प्रभु की उपासना में लीन रहता था | घंटो प्रभु के अलौकिक रूप को निहारता , परन्तु गिरधर ने उसे कभी भी दर्शन नही दिए | एक दिन भक्त हताश होकर चिल्लाने लगा – मै बड़ा अधम हूँ , इसीलिए मुरलीधर ने मुझे दर्शन नहीं दिए | अच्छा यही होगा कि मैं अपने प्राण त्याग दूँ | यह सोचकर भक्त अँधेरा होते ही अपनी कुटिया से निकल , यमुना कि ओर चल दिया | उसने निश्चय किया कि आज यमुना जी की पवित्र लहरों में कूदकर अपने प्राण त्याग दूंगा | इसी विचार में उलझा हुआ , वह यमुना तट की ओर जा रहा था कि एक कोढ़ी ने उसके पैर पकड़ लिये | दरअसल श्री कृष्ण ने उस कोढ़ी को सपने में यह कह दिया था कि कुछ देर बाद इधर से एक भक्त यमुना कि ओर जायगा | तू उसके पैर पकड़ लेना ओर कहना कि वह तेरा कोढ़ दूर कर दे कोढ़ी ने पैर पकड़े तो भक्त सकपका कर बोला – मुझ जैसे अभागे के पैर क्यों पकड़ते हो ? किसी साधू – महात्मा के पैर पकड़ो , तुम्हारा कल्याण होगा |
कोढ़ी गिड़गिडाकर बोला – ‘मेरा कोढ़ दूर कर दो | तुम प्रभु से कह दोगे तो मेरा रोग मिट जाएगा’ | भक्त मायूस होकर बोला – भाई ! अगर ऐसा ही होता तो मैं आज अपने प्राण नहीं त्याग रहा होता | मैं कई सालो से कृष्ण- बिहारी [...]

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“पापा! आप एक घंटें में कितना कमाते हैं “

वह महानगर की सिर खपाऊ नौकरी में लगा हुआ था | एक – एक मिनट की कीमत उसके लिए बहुत थी | उसे तरक्की करनी थी | आगे जाना था | घर – परिवार के लिए सुख – सुविधाएँ जुटानी थी | आठ साल का उसका बेटा उससे कोई सवाल कर सके, ऐसे मौके कम ही आते थे | जब तक वह लौट कर आता, बेटा सो चुका होता था या सोने की तैयारी कर रहा होता था | पर उस दिन वह जगा हुआ था | दफ्तर से थका – मांदा लौटा पिता कपड़ें चेंज कर रहा था कि बेटा अचानक पूछ बैठा, पापा ! आपको एक घंटा काम करने के कितने रुपये मिलते है ? सवाल अजीब था | वह चिढ गया | इतने छोटे से बच्चे को इससे क्या मतलब है कि उसके पिता को एक घंटे के लिए क्यामिलता है ? उसने झिड़क दिया, फालतू बाते नहीं करते, जाओ सो जाओ | बेटा अपने कमरे में चला गया | हाथ मुहं धोकर थोड़ा फ्रेश होने पर उसने सोचा, बेकार ही झिड़क दिया | बच्चा है, हो सकता है मन में कोई सवाल उठा हो, हो सकता है बड़ा होकर वह उससे भी ज्यादा कमाने का सपना देख रहा हो | हो सकता है उसे अपने दोस्त के बीच डींग ही हांकनी हो | खाना खाने के बाद वह अपने बेटे के कमरे में गया | अभी वह सोया नहीं था | कोई कहानी पढ़ रहा था | उसने प्यार से बेटे के सिर पर [...]

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” शांति की तलाश “

भगवान ने सृष्टि की रचना की | इसके बाद सृष्टि में सभी के गुजारे के लिए क्या -क्या चाहिए , वह देने का कार्य शुरू किया | किसी को आयुष्य चाहिए था तो किसी को धन -संपत्ति ,किसी को बल, किसी को विद्या | भगवान से जिसने जो माँगा , प्रभु ने कृपा कर उसे वही प्रदान किया | भगवान के पास जिसने जो देखा उसमें से सबने अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार उसे मांग लिया | इस वितरण कार्य में भगवान ने किसी प्रकार की कृपणता नहीं की |
वितरण का कार्य चल ही रहा था कि भगवान के हाथ से शांति गिरकर जमीन पर आ गिरी | भगवान ने उसे अपने पैरों के नीचे दबा लिया |किसी ने भगवान के उस कार्य को नहीं देखा | लेकिन लक्ष्मी जी की नजर से यह घटना नहीं बची | सभी लोग भगवान के पास से अपनी इच्छित सामग्री लेकर चले गए | उसके बाद प्रभु ने पैर के नीचे दबी ” शांति ” को उठाकर अपने पास रख लिया | इस पर लक्ष्मी जी ने भगवान से पूछा – प्रभो ! आपने ऐसा क्यों किया ? भगवान ने उत्तर दिया – देवी ! सारे मनुष्य अपनी -अपनी इच्छित सामग्री लेकर यहाँ से चले गए हैं | अब उन्हें मेरी आवश्यकता नहीं रह गयी है | उनके पास सब कुछ है लेकिन शांति नहीं है | शांति के लिए उन्हें मेरे पास आना होगा| भोग और अशांति से जब वे ऊब जायेंगे , तब उन्हें उसकी तलाश करनी [...]

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” स्वयं को बदलने की कोशिश करो ”

एक बार तुम यह जान लेते हो कि कारण तुम्ही हो , तो आधी समस्या का निदान अचानक हो जाता है, क्योंकि तब तुम उनको सहयोग नहीं दे सकते | तब तुम इतने ना समझ नहीं रहोगे कि तुम उस कारण को बढ़ावा दो जिनसे दुःख उत्पन्न होते हैं | उस कारण के साथ तुम्हारा सहयोग बंद हो जायेगा| पुरानी आदतों के कारण एक क्षण के लिए समस्याएं आयेंगी | तुम्हारे सावधान होने पर भी, एक क्षण के लिए तुम्हारी पुरानी आदतें तुम्हे उसी दिशा में जाने के लिए बाध्य करेंगी | लेकिन ऐसा अधिक दिनों तक नहीं चल सकता | अब इस काम के लिए उर्जा शेष नहीं रही | थोड़े दिनों तक इसका अवशेष रह सकता है लेकिन समय के साथ यह नष्ट हो जायगा | इस अभ्यास को हर रोज बढाने कि जरुरत है | इसे हर रोज सशक्त बनाने की जरुरत है |इसे तुम्हारे सतत सहयोग की आवश्यकता है| जब एक बार तुम सजग हो जाते हो कि अपने दुखों का कारण तुम स्वयं हो, फिर तुम इसे सहयोग देना बंद कर देते हो |
मैं तुमसे जो कुछ भी कह रहा हूँ वह सिर्फ तुम्हें एक तथ्य के प्रति सावधान करने के लिए कह रहा हूँ – तुम जहाँ हो , जैसे हो, उस सबका कारण तुम्ही हो | और यह एक बहुत ही आशा भरी बात है | यदि कारण कोई दूसरा होता तो कुछ भी नहीं किया जा सकता | यदि तुम्हीं कारण हो तो तुम इसे बदल भी सकते हो |यदि [...]

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” जैसा मन में भरा होगा वैसा ही जीवन मिलेगा ”

भागवत पुराण के अनुसार एक राजा हुए जिनका नाम था भरत | वे बहुत ही पराक्रमी और धार्मिक राजा थे | जब उन्हें वैराग्य हुआ तो उनके मन में आया कि इस भौतिक जगत , राज्य इत्यादि में रहने से भक्ति होगी नही , अतः वन में जाना चाहिए | राज त्याग कर वे वन में चले गए | एक कुटिया बनायी और कंद – मूल खाकर रहने लगे | अच्छी दिनचर्या – केवल प्रभु का ध्यान और साधना |
जहां झोंपड़ी बनाई थी , वंही पास में जलधारा बहती थी , जिसमे जंगली जानवर अक्सर जल पीने आते थे | एक बार राजा बाहर बैठकर भगवत – चिंतन कर रहे थे कि देखा , एक हिरनी अपने बच्चे के साथ उस जलधारा में जल पी रही थी | अचानक निकट ही उन्हें शेर के दहाड़ने की आवाज सुनाई दी | शेर की दहाड़ सुनकर हिरनी घबराकर वेग से जलधारा के पार कूदी | माँ के पीछे -पीछे उसका बच्चा भी कूदा , मगर बीच में ही गिर गया और जान बचाने के लिए हाथ – पैर मारने लगा | बहुत असहाय अवस्था थी | राजा को दया आई | वे जाकर बच्चे को धरा से निकाल लाये | कहीं उसे कोई जंगली जानवर न खा जाये , इस भय से हिरन के बच्चे को अपनी झोंपड़ी में ही रख लिया| धीरे – धीरे वह बड़ा होने लगा | राजा कभी उसके लिए कोमल घास इकठ्ठा करते , तो कभी दूध की व्यवस्था करते | वे उसकी गतिविधियों में खोने [...]

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” खुशी का मनोवैज्ञानिक सिद्धांत “

खुशी का कोई फार्मूला नही होता | यदि फार्मूला होता तो खुशी भी बाजार में बिकती और दुनिया के तमाम धनवान खुश नजर आते | किन्तु ऐसा संभव नही है | भूल जाना जरूरी है किन्तु हम भूलना पसंद नहीं करते | वही सब कुछ बेवजह याद करते रहते हैं जो भुला दिया जाना चाहिए था | दौलत की तरह खुशियाँ नहीं बंटती जब कि खुशियाँ बंटनी चाहिए | दुर्भाग्य यह है कि परिवार बंट रहे हैं , समाज बंट रहा है और तो और देश भी बाँटने के षड्यंत्र रचे जा रहें हैं |
जीवन में सफलता एक दिन का चमत्कार नही है | कठोर परिश्रम और मेहनत ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है | अगर हम यह समझ लें कि हमें जो कुछ भी मिला है , वह ईश्वर की कृपा है तो जीवन जीना आसान हो जायेगा | विनयशीलता और दूसरों का आदर हमेशा बड़ा बनाते हैं | सबसे जरूरी है , छोटे – छोटे सुखों में अपनी खुशी तलाशना | हमें चाहिए कि सीमाओं के भीतर सादा जीवन जियें , अपनी पूंजी बांटे , खुशियाँ बाँटें | खुशी अपने भीतर होती है , उसे पहचानने की जरूरत है | सुख का सभी इन्तजार करते हैं लेकिन यह भी याद रखना जरूरी है कि सुख कभी अकेला नही आता | वह अपने साथ – साथ संताप , दुखः , पीड़ा , कुंठा और भय भी लिए आता है | अतः हर पल को जीना सीखना जरूरी है | जिस तरह हम खुशियों के लिए बाँहें [...]

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” संगत का परिणाम “

एक राजहंस था | वह अपने बंधु – मित्रों से मिलने दूर देश गया था | बहुत दिन हो गए तो वहां से लौटने लगा | लम्बी यात्रा के कारण वह बहुत थक गया था | एक जगह उसे एक सुन्दर बगीचा नजर आया | वह विश्राम करने के लिए वहीँ रूक गया | उसी समय उस उद्यान में राजकुमार भी भ्रमण करने आया हुआ था | राजकुमार राजहंस की सुन्दरता पर मुग्ध हो गया | उसने हंस को वहीँ ठहरने को कहा | हंस ने उसकी बात मान ली | वह राजकुमार के साथ हाथी पर बैठकर सैर करता , मौज करता , मोती चुगता , बहुत प्रसन्न रहता | उसी उद्यान में एक पेड़ पर कौआ रहता था | उसे राजहंस और राजकुमार की मित्रता पर बहुत ईर्ष्या होती | वह भी उन दोनों का धर्म-भाई बन गया | अब कौआ भी हौद में बैठकर हाथी पर सैर करता और फल -फूल खाकर मौज करता |
कुछ दिन इसी तरह बीते | हंस को अपने घरवालों की याद सताने लगी | वह राजकुमार से विदा लेकर उड़ने लगा तभी कौआ बोला – ” भाई ! रस्ते में एक दिन के लिए मेरे घर भी ठहरो | ” हंस ने कहा -” ठीक है भाई ! तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ | जहाँ तुम्हारा घर आ जाये , मुझे बता देना | ” धूर्त कौआ हंस की पीठ पर बैठ कर उड़ते हुए हंस के पंख कुतरने लगा | कौए का घर आते ही हंस नीचे उतरा और अपनी [...]

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“भगवान राम और भगवान कृष्ण”

भगवान् राम का चरित्र सर्वथा अनुकरणीय है | उनकी लीला का अनुकरण करो तो भगवान मिलेंगे | भगवान कृष्ण का चरित्र   चिंतनीय है | श्री कृष्ण की लीला चिंतन करने के लिए और चिंतन करके तन्मय होने के लिए है | राम ने ” जो किया ” वह करना है परन्तु श्री कृष्ण ने ” जो कहा ” वह करना है | जब तक राम नहीं आते हैं , तब तक कृष्ण भी नहीं आते हैं | भागवत में मुख्य कथा श्री कृष्ण है | फिर भी राम के आगमन के पश्चात् ही श्री कृष्ण का आगमन होता है | जिसके घर में राम नहीं आते हैं , उसके रावण रूपी काम का नाश नहीं होता और जब तक काम रूपी रावण नहीं मरता , तब तक श्री कृष्ण नहीं आते हैं | इस काम रूपी रावण को ही मारना है | आप चाहें किसी भी सम्प्रदाय के हों , जब तक आप राम की मर्यादा का पालन नहीं करेंगे , आनंद नहीं मिलेगा | मनुष्य को थोड़ा सा धन संपत्ति मिलते ही मर्यादा को भूल जाता है |
राम जी का माता -प्रेम, पिता -प्रेम, भाई – प्रेम , एक पत्नी व्रत आदि सभी कुछ जीवन में उतारने योग्य है |श्री कृष्ण जो करते थे वही सब कुछ करना क्या हमारे लिए संभव है? उन्होंने तो कालिया नाग को वश में करके उसके सिर पर नृत्य किया था | गोवर्धन पर्वत को भी उंगली पर उठा लिया था | क्या हम कर पायेगें ? श्री कृष्ण का [...]

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