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” सावधान आईने को मत तोड़ो! “

एक पागल आदमी था | वो अपने आप को बहुत सुन्दर समझता था | जैसा की सब पागल समझतें हैं की पृथ्वी पर उस जैसा सुन्दर दूसरा कोई नहीं है | यही पागलपन के लक्षण है लेकिन वह आईने के सामने जाने से डरता था, लेकिन जब भी कोई उसके सामने आइना ले आता तो वह आईना फोड़ देता था | लोग पूछते ऐसा क्यों? तो वह कहता में इतना सुन्दर हूँ और आईना कुछ ऐसे गड़बड़ करता है की मुझे कुरूप बना देता है | मैं किसी आईने को नहीं सहूँगा |  वह कभी आईना नहीं देखता |
मनुष्य भी पागल की तरह व्यवहार करता है | वह यह नहीं सोचता की आईना वही तस्वीर दिखाता है, जो मैं हूँ | आईने को मेरा कोई पता तो मालूम नहीं जो वह मुझे बदसूरत बनायेगा | लेकिन बजाये यह देखने की, हम आईना तोड़ने में लग जाते हैं | परेशानियों से दूर भागने वाले लोग उन्ही आईना तोड़ने वाले लोगो की तरह होते हैं | अगर संसार आपको दुःख का कारण लगने लगे, तो याद रखना संसार एक दर्पण से ज्यादा नहीं | अगर कांटें इकट्ठे किये हैं तो दिखाई तो पड़ेंगे | यह दुनिया हमारा ही अक्स है | क्या कभी कोई अपने अक्स को कैद कर पाया है, नहीं ना ? तो आप कैसे कर पायेंगे | अगर परेशानियों से पीछा छुड़वाना है तो खुद को बदलना होगा ना कि आईने को तोड़ना [...]

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” अभाव में जीना सीखें आनंद अपने आप मिलेगा “

दुनिया सुखो के पीछे दौड़ रही है| हर कोई सब कुछ पाने की होड़ में लगा है| हम खुद भी ऐसे हैं और बच्चों को भी इसी दौड़ में  जुटा दिया है| हर सुख, सारी सुविधा और दुनिया भर का वैभव हर एक की दिली तमन्ना हो गयी है| एक चीज़ का अभाव भी बर्दाशत नहीं है| थोड़ी सी असफलता हमें तोड़ देती है| लेकिन इसके बाद भी जो नहीं मिल पा रहा है वो है आनंद| दरअसल यह आनंद सब कुछ पा लेने में नहीं है| कभी – कभी अभाव में जीना भी आनंद देने लगता है|
अगर आपके अन्दर कोई अभाव है तो उसे सद्गुणों से भरने का प्रयास करें| महत्वाकांक्षाओं को हावी न होने दे| मन चाहा मिल जाए इसके लिये तेज़ी से दौड़ रही है दुनिया| न मिलने का विचार तो लोगो को भीतर तक हिला देता है| संतों ने बार – बार कहा है जो है उसका उपयोग करो और जो नहीं है उसके बारे में सोच – सोच कर तनाव में मत आओ| हम जो नहीं हैं उसे हानि मन कर जो है उसका भी लाभ नहीं उठा पाते हैं| संतो के पास यह कला होती है की वह अभाव का भी आनंद उठा लेते हैं| हमारे लिये दो उदहारण काफी हैं| श्री राम वनवास में पूरी तरह से अभाव में थे| जिनका कल राजतिलक होने वाला था उन्हें चौदह वर्ष वनवास जाना पड़ा| इधर रावण के पास ऐसी सत्ता थी [...]

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‘ सफलता के नशे में माँ – बाप को मत भूलो ‘

 
राजा ज्ञानसेन के दरबार में प्रायः शास्त्रार्थ हुआ करता था| जो विजयी होता ज्ञानसेन उसे धन और मान से उपकृत करते| एक दिन ज्ञानसेन के दरबार में शास्त्रार्थ  चल रहा था| उस शास्त्रार्थ में विद्यवानभारवि विजेता घोषित किये गए| ज्ञानसेन ने उन्हें हाथी पर बिठाया और स्वयं चँवर डुलाते हुए उनके घर तक ले गए| भारवि जब ऐसे बड़े सम्मान के साथ घर पहुँचे तो उनके माता – पिता की ख़ुशी का ठिकाना न रहा|
घर लौट कर भारवि ने सर्व प्रथम अपनी माता को प्रणाम किया किन्तु पिता की ओर उपेक्षा भरा अभिवादन मात्र किया| माता को यह उचित नहीं लगा| उन्होंने भारवि को साष्टांग दंडवत के लिए इशारा किया| तो उन्होंने बड़े बेमन से इसका निर्वाह किया| पिता ने भी बेमन से चिरंजीवी रहो कह दिया| बात समाप्त हो गयी लेकिन माँ – बाप खिन्न बने रह गए| उन्हें वैसी प्रसन्नता नहीं थी जैसी होनी चहिए थी| कारण भी स्पष्ट था| किसी भी बड़ी उपलब्धि को अर्जित करने पर संतान जिस विनम्रता के भाव से माता पिता को नमन करती है उसका भारवि में सर्वथा अभाव था| उन्हें तो राजा के द्वारा हाथी पर बिठाकर चंवर डुलाते हुए घर तक लाने का अहंकार था| इस अहंकार में उन्होंने शिष्टाचार और विनम्रता को भुला दिया| थोड़े दिनों तक माता पिता की खिन्नता देखने के बाद भारवि माता से कारन पूछने गये| माता बोली विजय होकर लौटने के पीछे तुम्हारे पिता की कठोर साधना [...]

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‘ नब्बे नहीं पूरे सौ चाहिए ‘

हम में से अधिकतर लोगों के साथ यही समस्या है | जेब में नब्बे रूपये हैं, तो उसका फायदा नहीं उठाएंगे | बस इसी प्रयास में लगे रहेंगे कि दस रूपये और मिल जाँय और पूरे सौ हो जाए | नब्बे रूपये का सुख नहीं भोगेंगे | दस रूपये का दुःख भोगेंगे | हम कभी अपने से छोटों को देखकर नहीं जीते हैं | हम सभी कम्पटीशन में जी रहें हैं, इसीलिए दुखी हैं | अगर पडौसी के घर में कार हो और हमारे घर में नहीं तो यह हमारे लिए सीधी चुनौती हो जाती है | इसलिए, जीवन में इतने दुःख , इतना संघर्ष और इतनी पीडाएं हैं | क्योंकि जीवन में केवल वही सुखी है जो दुःख में भी सुख खोजकर जीना जानता है|
एक बार की बात है – एक महात्मा के पास एक आदमी और उसकी पत्नी पहुंचे | बड़े परेशान, से और बुझे -बुझे से लग रहे थे | महात्मा जी ने उनसे उनकी परेशानी का कारण पुछा तो वे बोले मैं बहुत परेशान हूँ | मुझे बिजनेस में एक लाख का घाटा हुआ है | मन बड़ा बैचैन हो गया है | उसके पीछे उसकी पत्नी बैठी थी | वह धीरे से, मुस्करायी और बोली महाराज मेरे पति झूठ बोल रहे हैं | इनकी बातों में मत आना, इन्हें कोई घाटा नही हुआ | महात्मा ने कहा आखिर सच्चाई क्या है | तुम कहते हो घाटा , पत्नी कहती है कोई घाटा नही , सही क्या है ? वह आदमी बोला , मेरी पत्नी नही [...]

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सबसे बड़ा धन

एक भिखारी भूख – प्यास से त्रस्त होकर आत्महत्या की योजना बना रहा था , तभी वहां से एक नेत्रहीन महात्मा गुजरे | भिखारी ने उन्हें अपने मन की व्यथा सुनाई और कहा , ” मैं अपनी गरीबी से तंग आकर आत्महत्या करना चाहता हूँ |” उसकी बात सुन महात्मा हँसे और बोले , “ठीक है, आत्महत्या करो लेकिन पहले अपनी एक आंख मुझे दे दो | मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी चोंका | उसने कहा , “आप कैसी बात करते हैं | मैं आंख कैसे दे सकता हूँ |”
महात्मा बोले, “आंख न सही , एक हाथ ही दे दो , मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी असमंजस में पड़ गया | महात्मा मुस्कराते हुए बोले, संसार में सबसे बड़ा धन निरोगी काया है | तुम्हारे हाथ-पाव ठीक है, शारीर स्वस्थ है, तुमसे बड़ा धनी और कौन हो सकता है | तुमसे गरीब तो में हूँ कि मेरी आँखें नहीं हैं मगर में तो कभी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचता | भिखारी ने उनसे छमा मांगी और संकल्प किया कि वह कोई काम करके जीवन-यापन करेगा |
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“काम करने का ढंग”

एक संत अपने शिष्यों के साथ तीर्थ यात्रा पर निकले| रस्ते में निर्माणाधीन मंदिर पर कुछ मजदूर कार्य कर रहे थे| स्वामीजी ने एक मजदूर से पूछा – “भाई क्या कर रहे हो?” उसने उत्तर दिया के आपको दिखाई नहीं दे रहा है की हम गधे की तरह मजदूरी कर रहे है| ठेकेदार दम नहीं लेने देता |
दुसरे मजदूर से पूछने पर उसने कहा की महाराज | मंदिर बन रहा है| हमारी किस्मत में तो मजदूरी करनी लिखी है सो कर रहे है| थोड़ी ही दूर पर एक मजदूर सिर पर तगारी लिए चूना-पत्थर दौड-दौड़ कर पंहुचा रहा था| संत नर वही प्रश्न उससे दोहराया| उसने कहा की स्वामीजी हमारे धन्य भाग्य है| गाँव में मंदिर बन रहा है और मुझे भी यहाँ किस्मत से काम मिल गया है| भगवन की सेवा भी हो रही है तथा जीवन बसर भी हो रहा है|
संत ने शिष्यों को समझाया कि एक ही काम को एक व्यक्ति मजबूरी में तथा दूसरा व्यक्ति भाग्य को दोष देता हुआ एवं तीसरा व्यक्ति उत्साह से कर रहा है| यही काम उनकी गुणवत्ता में भी दिखाई देती है|
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प्रशंसा

“आप माला के दाने बाहर की ओर फेरते है और हम अन्दर की ओर| बताइए इन दोनों में से कौन का तरीका श्रेष्ट है ? ” पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह ने सिख साम्राज्य के विदेश मंत्री फकीर अजीदुद्दीन से पूछा|
फकीर ने बड़ी बुद्धिमतापूर्वक इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में दिया – “महाराज | मुस्लमान माला के दाने बाहर की ओर फेरकर दोष निकलने का प्रयास करते है, जबकि हिन्दू अन्दर की ओर फेरकर गुण ग्रहण करने का यत्न करते है | ”
प्रसन्न होकर महाराज ने उनकी प्रशंसा भरे दरबार में की|
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यज्ञ क्या है

यज्ञ क्या है – इसकी व्याख्या श्री मद्भागवत गीता में सूत्र रूप में तथा मानस में विस्तार से है | भगवान कहते हैं कि जो यज्ञ से बचे अन्न और वस्तु ग्रहण करते है वे ही व्यक्ति सच्चे अर्थों में धर्मं का पालन करते है | और जो व्यक्ति ऐसा नहीं करते वे चौर्यवृति वाले हैं | इसका अर्थ है कि भले ही आप और हम व्यक्ति के रूप में अलग – अलग हों , पर समाज के रूप में हम जुड़े हुएं हैं , एक हैं | हमारा जन्म माता – पिता के माध्यम से होता है | बाल्यावाश्ता में वे हमारा लालन – पालन करते हैं | गुरुजनों से हम शिक्षा – दीक्षा प्राप्त करते हैं | अब यदि बड़ा हो जाने पर व्यक्ति स्वार्थी बनकर अपनी ही चिंता करता रहे , तो जिन लोगों के सहयोग से वह पला – बढा है , जिनका उस पर ऋण है उसको चुकाना चाहिए | इसीलिए कहा गया है कि हमारा कर्म – ज्ञानकर्म – होना चाहिए |
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” सीख दीजिये ताहि को जाको सीख सुहाय “

एक सूक्ति संसार की प्रायः सभी भाषाओं में सुनने को मिलती है कि हमें अपात्र व्यक्ति को कभी कोई शिक्षा नही देनी चाहिए | अन्यथा लाभ के बजाय हानि हो सकती है | गावों में लोग अक्सर एक दोहा सुनाते हैं –
” सीख दीजिये ताहि को , जाको सीख सुहाय |
सीख न दीजिये वानरा , घर चिड़िया को जाय | |”
इस दोहे के पीछे एक कथा है और वह कथा भारत की प्राचीन भाषा प्राकृत के साहित्य में भी उपलब्ध है | कथा यूं है कि — वर्षा काल में शीत से कांपते एक वानर को देखकर एक बया ने उससे कहा – हे वानर ! पुरुष के सामान हाथ – पैर वाले होकर भी तुम कोई कुटिया क्यों नहीं बना लेते ? व्यर्थ ही क्यों ठिठुर रहे हो ? बया से यह उपदेश सुनकर उस वानर को क्रोध उत्पन्न हुआ और उसने उसके घोंसले को उजाड़ कर तिनका -तिनका कर हवा में उछाल दिया | फिर बोला – हे सुघरे ! अब तू भी बिना घर के रह | प्राकृत और लोक – साहित्य में इस सूक्ति के मिलने से यह स्पष्ट होता है कि यह हमारे पूर्वजों के परिपक्व अनुभव के आधार पर गढा गया सूत्र है | सुचिंतित सन्देश है और इसे हमें जीवन में सदैव याद रखना चाहिए | हम अक्सर किसी को भी कुछ शिक्षा [...]

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“प्रार्थना की शक्ति”

भगवान् श्री कृष्ण का एक अनन्य भक्त था | वह बृन्दावन में प्रभु की उपासना में लीन रहता था | घंटो प्रभु के अलौकिक रूप को निहारता , परन्तु गिरधर ने उसे कभी भी दर्शन नही दिए | एक दिन भक्त हताश होकर चिल्लाने लगा – मै बड़ा अधम हूँ , इसीलिए मुरलीधर ने मुझे दर्शन नहीं दिए | अच्छा यही होगा कि मैं अपने प्राण त्याग दूँ | यह सोचकर भक्त अँधेरा होते ही अपनी कुटिया से निकल , यमुना कि ओर चल दिया | उसने निश्चय किया कि आज यमुना जी की पवित्र लहरों में कूदकर अपने प्राण त्याग दूंगा | इसी विचार में उलझा हुआ , वह यमुना तट की ओर जा रहा था कि एक कोढ़ी ने उसके पैर पकड़ लिये | दरअसल श्री कृष्ण ने उस कोढ़ी को सपने में यह कह दिया था कि कुछ देर बाद इधर से एक भक्त यमुना कि ओर जायगा | तू उसके पैर पकड़ लेना ओर कहना कि वह तेरा कोढ़ दूर कर दे कोढ़ी ने पैर पकड़े तो भक्त सकपका कर बोला – मुझ जैसे अभागे के पैर क्यों पकड़ते हो ? किसी साधू – महात्मा के पैर पकड़ो , तुम्हारा कल्याण होगा |
कोढ़ी गिड़गिडाकर बोला – ‘मेरा कोढ़ दूर कर दो | तुम प्रभु से कह दोगे तो मेरा रोग मिट जाएगा’ | भक्त मायूस होकर बोला – भाई ! अगर ऐसा ही होता तो मैं आज अपने प्राण नहीं त्याग रहा होता | मैं कई सालो से कृष्ण- बिहारी [...]

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“पापा! आप एक घंटें में कितना कमाते हैं “

वह महानगर की सिर खपाऊ नौकरी में लगा हुआ था | एक – एक मिनट की कीमत उसके लिए बहुत थी | उसे तरक्की करनी थी | आगे जाना था | घर – परिवार के लिए सुख – सुविधाएँ जुटानी थी | आठ साल का उसका बेटा उससे कोई सवाल कर सके, ऐसे मौके कम ही आते थे | जब तक वह लौट कर आता, बेटा सो चुका होता था या सोने की तैयारी कर रहा होता था | पर उस दिन वह जगा हुआ था | दफ्तर से थका – मांदा लौटा पिता कपड़ें चेंज कर रहा था कि बेटा अचानक पूछ बैठा, पापा ! आपको एक घंटा काम करने के कितने रुपये मिलते है ? सवाल अजीब था | वह चिढ गया | इतने छोटे से बच्चे को इससे क्या मतलब है कि उसके पिता को एक घंटे के लिए क्यामिलता है ? उसने झिड़क दिया, फालतू बाते नहीं करते, जाओ सो जाओ | बेटा अपने कमरे में चला गया | हाथ मुहं धोकर थोड़ा फ्रेश होने पर उसने सोचा, बेकार ही झिड़क दिया | बच्चा है, हो सकता है मन में कोई सवाल उठा हो, हो सकता है बड़ा होकर वह उससे भी ज्यादा कमाने का सपना देख रहा हो | हो सकता है उसे अपने दोस्त के बीच डींग ही हांकनी हो | खाना खाने के बाद वह अपने बेटे के कमरे में गया | अभी वह सोया नहीं था | कोई कहानी पढ़ रहा था | उसने प्यार से बेटे के सिर पर [...]

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” शांति की तलाश “

भगवान ने सृष्टि की रचना की | इसके बाद सृष्टि में सभी के गुजारे के लिए क्या -क्या चाहिए , वह देने का कार्य शुरू किया | किसी को आयुष्य चाहिए था तो किसी को धन -संपत्ति ,किसी को बल, किसी को विद्या | भगवान से जिसने जो माँगा , प्रभु ने कृपा कर उसे वही प्रदान किया | भगवान के पास जिसने जो देखा उसमें से सबने अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार उसे मांग लिया | इस वितरण कार्य में भगवान ने किसी प्रकार की कृपणता नहीं की |
वितरण का कार्य चल ही रहा था कि भगवान के हाथ से शांति गिरकर जमीन पर आ गिरी | भगवान ने उसे अपने पैरों के नीचे दबा लिया |किसी ने भगवान के उस कार्य को नहीं देखा | लेकिन लक्ष्मी जी की नजर से यह घटना नहीं बची | सभी लोग भगवान के पास से अपनी इच्छित सामग्री लेकर चले गए | उसके बाद प्रभु ने पैर के नीचे दबी ” शांति ” को उठाकर अपने पास रख लिया | इस पर लक्ष्मी जी ने भगवान से पूछा – प्रभो ! आपने ऐसा क्यों किया ? भगवान ने उत्तर दिया – देवी ! सारे मनुष्य अपनी -अपनी इच्छित सामग्री लेकर यहाँ से चले गए हैं | अब उन्हें मेरी आवश्यकता नहीं रह गयी है | उनके पास सब कुछ है लेकिन शांति नहीं है | शांति के लिए उन्हें मेरे पास आना होगा| भोग और अशांति से जब वे ऊब जायेंगे , तब उन्हें उसकी तलाश करनी [...]

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” स्वयं को बदलने की कोशिश करो ”

एक बार तुम यह जान लेते हो कि कारण तुम्ही हो , तो आधी समस्या का निदान अचानक हो जाता है, क्योंकि तब तुम उनको सहयोग नहीं दे सकते | तब तुम इतने ना समझ नहीं रहोगे कि तुम उस कारण को बढ़ावा दो जिनसे दुःख उत्पन्न होते हैं | उस कारण के साथ तुम्हारा सहयोग बंद हो जायेगा| पुरानी आदतों के कारण एक क्षण के लिए समस्याएं आयेंगी | तुम्हारे सावधान होने पर भी, एक क्षण के लिए तुम्हारी पुरानी आदतें तुम्हे उसी दिशा में जाने के लिए बाध्य करेंगी | लेकिन ऐसा अधिक दिनों तक नहीं चल सकता | अब इस काम के लिए उर्जा शेष नहीं रही | थोड़े दिनों तक इसका अवशेष रह सकता है लेकिन समय के साथ यह नष्ट हो जायगा | इस अभ्यास को हर रोज बढाने कि जरुरत है | इसे हर रोज सशक्त बनाने की जरुरत है |इसे तुम्हारे सतत सहयोग की आवश्यकता है| जब एक बार तुम सजग हो जाते हो कि अपने दुखों का कारण तुम स्वयं हो, फिर तुम इसे सहयोग देना बंद कर देते हो |
मैं तुमसे जो कुछ भी कह रहा हूँ वह सिर्फ तुम्हें एक तथ्य के प्रति सावधान करने के लिए कह रहा हूँ – तुम जहाँ हो , जैसे हो, उस सबका कारण तुम्ही हो | और यह एक बहुत ही आशा भरी बात है | यदि कारण कोई दूसरा होता तो कुछ भी नहीं किया जा सकता | यदि तुम्हीं कारण हो तो तुम इसे बदल भी सकते हो |यदि [...]

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” जैसा मन में भरा होगा वैसा ही जीवन मिलेगा ”

भागवत पुराण के अनुसार एक राजा हुए जिनका नाम था भरत | वे बहुत ही पराक्रमी और धार्मिक राजा थे | जब उन्हें वैराग्य हुआ तो उनके मन में आया कि इस भौतिक जगत , राज्य इत्यादि में रहने से भक्ति होगी नही , अतः वन में जाना चाहिए | राज त्याग कर वे वन में चले गए | एक कुटिया बनायी और कंद – मूल खाकर रहने लगे | अच्छी दिनचर्या – केवल प्रभु का ध्यान और साधना |
जहां झोंपड़ी बनाई थी , वंही पास में जलधारा बहती थी , जिसमे जंगली जानवर अक्सर जल पीने आते थे | एक बार राजा बाहर बैठकर भगवत – चिंतन कर रहे थे कि देखा , एक हिरनी अपने बच्चे के साथ उस जलधारा में जल पी रही थी | अचानक निकट ही उन्हें शेर के दहाड़ने की आवाज सुनाई दी | शेर की दहाड़ सुनकर हिरनी घबराकर वेग से जलधारा के पार कूदी | माँ के पीछे -पीछे उसका बच्चा भी कूदा , मगर बीच में ही गिर गया और जान बचाने के लिए हाथ – पैर मारने लगा | बहुत असहाय अवस्था थी | राजा को दया आई | वे जाकर बच्चे को धरा से निकाल लाये | कहीं उसे कोई जंगली जानवर न खा जाये , इस भय से हिरन के बच्चे को अपनी झोंपड़ी में ही रख लिया| धीरे – धीरे वह बड़ा होने लगा | राजा कभी उसके लिए कोमल घास इकठ्ठा करते , तो कभी दूध की व्यवस्था करते | वे उसकी गतिविधियों में खोने [...]

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” खुशी का मनोवैज्ञानिक सिद्धांत “

खुशी का कोई फार्मूला नही होता | यदि फार्मूला होता तो खुशी भी बाजार में बिकती और दुनिया के तमाम धनवान खुश नजर आते | किन्तु ऐसा संभव नही है | भूल जाना जरूरी है किन्तु हम भूलना पसंद नहीं करते | वही सब कुछ बेवजह याद करते रहते हैं जो भुला दिया जाना चाहिए था | दौलत की तरह खुशियाँ नहीं बंटती जब कि खुशियाँ बंटनी चाहिए | दुर्भाग्य यह है कि परिवार बंट रहे हैं , समाज बंट रहा है और तो और देश भी बाँटने के षड्यंत्र रचे जा रहें हैं |
जीवन में सफलता एक दिन का चमत्कार नही है | कठोर परिश्रम और मेहनत ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है | अगर हम यह समझ लें कि हमें जो कुछ भी मिला है , वह ईश्वर की कृपा है तो जीवन जीना आसान हो जायेगा | विनयशीलता और दूसरों का आदर हमेशा बड़ा बनाते हैं | सबसे जरूरी है , छोटे – छोटे सुखों में अपनी खुशी तलाशना | हमें चाहिए कि सीमाओं के भीतर सादा जीवन जियें , अपनी पूंजी बांटे , खुशियाँ बाँटें | खुशी अपने भीतर होती है , उसे पहचानने की जरूरत है | सुख का सभी इन्तजार करते हैं लेकिन यह भी याद रखना जरूरी है कि सुख कभी अकेला नही आता | वह अपने साथ – साथ संताप , दुखः , पीड़ा , कुंठा और भय भी लिए आता है | अतः हर पल को जीना सीखना जरूरी है | जिस तरह हम खुशियों के लिए बाँहें [...]

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