भागवत पुराण के अनुसार एक राजा हुए जिनका नाम था भरत | वे बहुत ही पराक्रमी और धार्मिक राजा थे | जब उन्हें वैराग्य हुआ तो उनके मन में आया कि इस भौतिक जगत , राज्य इत्यादि में रहने से भक्ति होगी नही , अतः वन में जाना चाहिए | राज त्याग कर वे वन में चले गए | एक कुटिया बनायी और कंद – मूल खाकर रहने लगे | अच्छी दिनचर्या – केवल प्रभु का ध्यान और साधना |
जहां झोंपड़ी बनाई थी , वंही पास में जलधारा बहती थी , जिसमे जंगली जानवर अक्सर जल पीने आते थे | एक बार राजा बाहर बैठकर भगवत – चिंतन कर रहे थे कि देखा , एक हिरनी अपने बच्चे के साथ उस जलधारा में जल पी रही थी | अचानक निकट ही उन्हें शेर के दहाड़ने की आवाज सुनाई दी | शेर की दहाड़ सुनकर हिरनी घबराकर वेग से जलधारा के पार कूदी | माँ के पीछे -पीछे उसका बच्चा भी कूदा , मगर बीच में ही गिर गया और जान बचाने के लिए हाथ – पैर मारने लगा | बहुत असहाय अवस्था थी | राजा को दया आई | वे जाकर बच्चे को धरा से निकाल लाये | कहीं उसे कोई जंगली जानवर न खा जाये , इस भय से हिरन के बच्चे को अपनी झोंपड़ी में ही रख लिया| धीरे – धीरे वह बड़ा होने लगा | राजा कभी उसके लिए कोमल घास इकठ्ठा करते , तो कभी दूध की व्यवस्था करते | वे उसकी गतिविधियों में खोने [...]
श्री मदभागवत गीता एक ओषधि है; जो संसार में कहीं उपलब्ध नहीं है| प्रातःकाल से रात तक हम धन कमाने में लगे रहते है| ‘क्या कभी हमने सोचा है कि हम इस उपार्जित राशि को अपने साथ ले जायेगे? जिसमे यह विचारने की शक्ति नहीं. आत्मा न तो धन ले जाती है न वह वासना ले जाती है इन आदतों को सुधारने के लिए गीता शास्त्र है|
ईश्वर कभी असत्य नहीं बोलता जो असत्य बोलता है वह ईश्वर नहीं है| बह संत नहीं जो बड़े आदमियो के गद्दे पर बैठ कर डोलता हो वह ईश्वर नहीं जो विजय भाव रखता हो ‘भारतवासी तभी तक जीवित है जब तक गीता साहित्य उपलभ्ध है’ गीता के श्रवण करने से इच्छाए कम होती है|
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