“आप माला के दाने बाहर की ओर फेरते है और हम अन्दर की ओर| बताइए इन दोनों में से कौन का तरीका श्रेष्ट है ? ” पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह ने सिख साम्राज्य के विदेश मंत्री फकीर अजीदुद्दीन से पूछा|
फकीर ने बड़ी बुद्धिमतापूर्वक इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में दिया – “महाराज | मुस्लमान माला के दाने बाहर की ओर फेरकर दोष निकलने का प्रयास करते है, जबकि हिन्दू अन्दर की ओर फेरकर गुण ग्रहण करने का यत्न करते है | ”
प्रसन्न होकर महाराज ने उनकी प्रशंसा भरे दरबार में की|
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लंका में जाने के लिए समुद्र पर सेतु का निर्माण किया जा रहा था | बन्दर और भालू पत्थरों पर भगवान श्री राम का नाम लिखकर एक किनारे रख रहे थे |
दूसरी तरफ से बन्दर और भालू आकर उन पत्थरों को समुद्र में डाल रहे थे | नल और नील के निर्देशन में बंदरों और भालूऔं का एक अलग समूह समुद्र में तैर रहे उन पत्थरों से सेतु का निर्माण कर रहा था | समुद्र में पत्थरों को तैरते देख भगवान राम के मन में कोतूहल हुआ | मेरे नाम लिखे ये पत्थर समुद्र में नहीं डूब रहे हैं| अगर मैं बिना नाम लिखे एक पत्थर को समुद्र में डाल दूँ ,तो क्या वे भी तैरेंगे ?
कोतूहलवश भगवान श्री राम आगे बढ़े | उन्होंने पत्थरों के ढेर में से एक ऐसा पत्थर उठाया , जिसपर उनका नाम नहीं लिखा गया था | भगवान ने उस पत्थर को देखा और समुद्र में फ़ेंक दिया| भगवान यह देख कर आश्चर्य में रह गए कि वह पत्थर समुद्र के जल में डूब गया | भगवान राम के मन में बड़ा संकोच हुआ | उन्होंने सिर घुमाकर आस -पास देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है| कोई नहीं दिखा तो पीछे घूम शिविर में लौटने का प्रयास करने लगे ,तभी देखा कि सामने कुछ दूरी पर हनुमान खड़ें हैं| हनुमान ने राम जी के चेहरे के भाव को पढ़ते हुए कहा ,प्रभू -आपने जिसे छोड़ दिया वह भला कैसे तैरेगा ? उसे तो डूबना ही है| सागर में वही तैर सकता है [...]
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