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जय हो … कई रूप में आये विधाता …

Song with beautiful lyrics taken from ChandraGupta Maurya

कई रूप में आये विधाता |
एक रूप है उनमे माता ||
कड़ी धूप में छाया बन जाए |
खुद भूखी रहके खिलाये ||
खुद की ना चिंता जिसको हो |
कभी ना पर है महान वो ||
जय हो .. जय हो ..
जय हो .. जय हो ..
जय हो .. जय हो ..
जय हो .. जय हो ..
माँ जैसी मातृभूमि है |
जो हमारे कारण ज़ख़्मी है ||
अन्याय है क्यों, गम क्यों है ?
निशब्द खड़े, हम क्यों हैं ? |२|
क्या दोष था, क्यों दंड हो?
अब जागे जा प्रचंड हो ||
जय हो .. जय हो ..
जय हो .. जय हो ..
जय हो .. जय हो ..
जय हो .. जय हो ..
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The message of Deepawali

According to the Vedic culture, the message of Tamaso ma jyotir gamaya (from darkness unto light) is given through the festival of Deepawali to all peoples of the world. During the night of Deepawali the myriads of little clay lamps (dias) seem to silently send forth Deepawali messages: Come let us remove darkness from the face of the earth. This is not the work to be done by one dia or by one individual. It requires collective effort. In the diffusion of light the question of high and low is forgotten. This is the lesson taught by both small and big dias.
The second message of the burning dias is to destroy the difference between rich and poor- the destruction of discrimination based on poverty and wealth. The burning dia, whether in a palatial bungalow or in a grass hut, is a symbol of this unity. The wall of separation based on economic status cannot prevent the penetration and spread of the light of the dia.
The third message of the burning dias of Deepawali is to kindle the extinguished lights of our neighbours. Let us find out what is needed- whether there is a shortage of wick or oil- and just by a little help the neighbour’s lamps can be lit. One dia can light several others. A little charity can bring joy to countless others.
The row of lamps teach yet another lesson and that is of unity as exemplified in Satyam, Shivam Sundaram- Truth, Joy and Beauty.
The lights of Deepavali [...]

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“सदगुरु मैं तेरी पतंग”

Lyrics:
सदगुरु मैं तेरी पतंग बाबा मैं तेरी पतंग – २
हवा विच उड़ती जावांगी-२, बाबा डोर हथों छड़ी न मैं कटी जावांगी
सदगुरु मैं तेरी पतंग बाबा मैं तेरी पतंग -२
बड़ी मुश्किल दे नल मिलिया मैनू तेरा दवारा है बाबा तेरा दवारा है -२
मैनू इको तेरा आसरा नाल तेरा सहारा है , बाबा तेरा सहारा है
हूँ तेरे ही भरोसे , बाबा तेरे ही भरोसे
हवा विच उड़ती जावांगी-२, बाबा डोर हथों छड़ी न मैं कटी जावांगी
सदगुरु मैं तेरी पतंग बाबा मैं तेरी पतंग -२
ऐना चरना कमला नालो मैनू दूर हटायीं न बाबा दूर हटायीं न -२
इस झूठे जग दे अन्दर मेरा पेचां लाई न , साईँ पेचां लाई न
जे कट गयीं ता सदगुरु -२
फिर मैं लुटी जावांगी , हो फिर मैं लुटी जावांगी
हवा विच उड़ती जावांगी-२, बाबा डोर हाथों छड़ी न मैं कटी जावांगी
सदगुरु मैं तेरी पतंग बाबा मैं तेरी पतंग -२
आज मालिया बुहा आके मैं तेरे दवार डा बाबा तेरे दवार डा -२
हाथ रखदे एक बारी तू मेरे सर ते प्यार डा , बाबा सर ते प्यार डा
फिर जनम मरण दे गेडे -२ तो मैं बच्दी जावांगी -२
हवा विच उड़ती जावांगी , बाबा डोर हाथों छड़ी न मैं कटी जावांगी
सदगुरु मैं तेरी पतंग बाबा मैं तेरी पतंग
सदगुरु मैं तेरी पतंग हवा विच उड़ती जावांगी
बाबा डोर हाथों छड़ी न मैं कटी जावांगी
सदगुरु मैं तेरी पतंग बाबा मैं तेरी पतंग
हवा विच उड़ती जावांगी-२, बाबा डोर हाथों छड़ी न मैं कटी जावांगी
सदगुरु मैं तेरी पतंग बाबा मैं तेरी पतंग -२
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साईं राम साईं श्याम साईं भगवान

 
Lyrics:
ॐ साईं राम
ॐ साईं श्याम
ॐ साईं भगवान
साईं राम साईं श्याम साईं भगवान
शिर्डी के दाता सबसे महान |२|
करुणा के सागर दया निधान
शिर्डी के दाता सबसे महान |
साईं राम साईं श्याम साईं भगवान
शिर्डी के दाता सबसे महान |
साईं चरण की धुल को माथे जो लगाओगे
पुण्य चारों धाम  का शिर्डी में ही पाओगे |
होगा तुम्हारा वहीँ कल्याण
शिर्डी के दाता सबसे महान |
साईं राम साईं श्याम साईं भगवान
शिर्डी के दाता सबसे महान |
कोई शेहेंशा उनको कहें शिव का ही तो रूप हैं
छाया हैं वो धर्म की कर्म की वो धुप है
पढ़के जो आये हैं वेद पुराण
शिर्डी के दाता सबसे महान |
साईं राम साईं श्याम साईं भगवान
शिर्डी के दाता सबसे महान |
मानवता के साईं रवि , दया के साईं चाँद है
साचे प्रेम डोर से रहे वो सबको बांध हैं
मंदिर मस्जिद एक समान
शिर्डी के दाता सबसे महान |
साईं राम साईं श्याम साईं भगवान
शिर्डी के दाता सबसे महान |
सबको समझते वो एक सा , राजा हो या रंक हो
भेद और भाव के मिटा रहे कलंक को
सबको समझते निज संतान
शिर्डी के दाता सबसे महान |
साईं राम साईं श्याम साईं भगवान
शिर्डी के दाता सबसे महान |
साईं के द्वार हर घड़ी , सत्य की बरखा हो रही
झूठे इस जहान के पाप काले हो रही
करते हैं शंका का समाधान
शिर्डी के दाता सबसे महान |
साईं राम साईं श्याम साईं भगवान
शिर्डी के दाता सबसे महान |
दर्द रहित कशिश भरी , साईं से निर्मल प्रीत लो
दुश्मनी जो कर रहे , उनके दिल भी जीत लो
सब पे चलते प्रेम के बान
शिर्डी के दाता सबसे महान |
साईं राम साईं श्याम साईं भगवान
शिर्डी के दाता सबसे महान [...]

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” सावधान आईने को मत तोड़ो! “

एक पागल आदमी था | वो अपने आप को बहुत सुन्दर समझता था | जैसा की सब पागल समझतें हैं की पृथ्वी पर उस जैसा सुन्दर दूसरा कोई नहीं है | यही पागलपन के लक्षण है लेकिन वह आईने के सामने जाने से डरता था, लेकिन जब भी कोई उसके सामने आइना ले आता तो वह आईना फोड़ देता था | लोग पूछते ऐसा क्यों? तो वह कहता में इतना सुन्दर हूँ और आईना कुछ ऐसे गड़बड़ करता है की मुझे कुरूप बना देता है | मैं किसी आईने को नहीं सहूँगा |  वह कभी आईना नहीं देखता |
मनुष्य भी पागल की तरह व्यवहार करता है | वह यह नहीं सोचता की आईना वही तस्वीर दिखाता है, जो मैं हूँ | आईने को मेरा कोई पता तो मालूम नहीं जो वह मुझे बदसूरत बनायेगा | लेकिन बजाये यह देखने की, हम आईना तोड़ने में लग जाते हैं | परेशानियों से दूर भागने वाले लोग उन्ही आईना तोड़ने वाले लोगो की तरह होते हैं | अगर संसार आपको दुःख का कारण लगने लगे, तो याद रखना संसार एक दर्पण से ज्यादा नहीं | अगर कांटें इकट्ठे किये हैं तो दिखाई तो पड़ेंगे | यह दुनिया हमारा ही अक्स है | क्या कभी कोई अपने अक्स को कैद कर पाया है, नहीं ना ? तो आप कैसे कर पायेंगे | अगर परेशानियों से पीछा छुड़वाना है तो खुद को बदलना होगा ना कि आईने को तोड़ना [...]

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” इश्वर की सत्ता “

एक बार काशी नरेश ने अपने गुरु को दरबार में बुलाया और आवभगत करने के बाद कहा ” गुरुदेव एक लम्बे अरसे से मुझे आपके धर्मोपदेश सुनने का सुअवसर प्राप्त होता रहा है| आप इश्वर की सत्ता और उसकी न्याय की बातें बताते रहें हैं | मेरी हार्दिक इच्छा है कि में इश्वर को साक्षात् देखूँ |” गुरु ने उत्तर दिया ” जिस प्रकार आपको अहसास है कि जो कपड़े आपने पहन रखें हैं, वें किसी और के बनाये हुए हैं, उसी प्रकार यह दिन रात, आकाश धरती आदि का बनाने वाला, हजारों प्रकार के जीव जंतुओं का निर्माण करने वाला भी कोई सर्व शक्तिमान है |” धर्मगुरु का उत्तर काशी नरेश को अश्वस्त नहीं कर सका | वह इश्वर का दर्शन करने का आग्रह करते रहे | आखिरकार गुरु ने सम्राट को यह विश्वास दिलाया की वह इसके लिए प्रयत्न करेंगे | दुसरे दिन दोपहर में जब सूर्य तप रहा था गुरु ने सम्राट के महल में जाकर कहा ” आपको शायद याद होगा की कल आपने इश्वर के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी | कृपया मेरे साथ चलिए | सम्राट तुरंत अपने गुरु के साथ बाहर आ गए |
कुछ शरण वे दोनों धुप में चलते रहे | फिर गुरु ने कहा ” सम्राट आकाश में तपते सूर्य की ओर देखें, सीधे सूर्य की ओर | और कहीं ध्यान न दें | यदि आपके मन में कोई गम हो तो उसे भी [...]

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Kahan Kahan Dhundhun Tuje Nazar Nahi Aaye (कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए)

Lyrics
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
भक्ति की लगन कान्हा काहे को लगाये काहे को लगाये
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
भक्ति की लगन कान्हा काहे को लगाये काहे को लगाये
जनम दिया तूने हमे जी नाही पाये
जनम दिया तूने हमे जी नाही पाये
माया में जीने को जी ललचाये
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
भक्ति की लगन कान्हा काहे को लगाये काहे को लगाये
काम क्रोध मोह हमसे छूट नाही पाए
काम क्रोध मोह हमसे छूट नाही पाए
बता दे हमे कान्हा कैसे छुडाये
बता दे हमे कान्हा कैसे छुडाये कैसे छुडाये
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
भक्ति की लगन कान्हा काहे को लगाये काहे को लगाये
हम तो तेरे बालक हैं काहे तू सताए
हम तो तेरे बालक हैं काहे सताए
तू ही हँसाए हमें तू ही रुलाए
तू ही हँसाए हमें तू ही रुलाए तू ही रुलाए
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
भक्ति की लगन कान्हा काहे को लगाये काहे को लगाये
मेरे दिल की धड़कन तुझे हर घड़ी पुकारे
मेरे दिल की धड़कन तुझे हर घड़ी पुकारे
आ जा कन्हईया अब तो दरस दिखा दे
आ जा कन्हईया अब तो दरस दिखा दे दरस दिखा दे
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
भक्ति की लगन कान्हा काहे को लगाये काहे को लगाये
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे नज़र नाही आए
भक्ति की लगन कान्हा काहे को [...]

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” अभाव में जीना सीखें आनंद अपने आप मिलेगा “

दुनिया सुखो के पीछे दौड़ रही है| हर कोई सब कुछ पाने की होड़ में लगा है| हम खुद भी ऐसे हैं और बच्चों को भी इसी दौड़ में  जुटा दिया है| हर सुख, सारी सुविधा और दुनिया भर का वैभव हर एक की दिली तमन्ना हो गयी है| एक चीज़ का अभाव भी बर्दाशत नहीं है| थोड़ी सी असफलता हमें तोड़ देती है| लेकिन इसके बाद भी जो नहीं मिल पा रहा है वो है आनंद| दरअसल यह आनंद सब कुछ पा लेने में नहीं है| कभी – कभी अभाव में जीना भी आनंद देने लगता है|
अगर आपके अन्दर कोई अभाव है तो उसे सद्गुणों से भरने का प्रयास करें| महत्वाकांक्षाओं को हावी न होने दे| मन चाहा मिल जाए इसके लिये तेज़ी से दौड़ रही है दुनिया| न मिलने का विचार तो लोगो को भीतर तक हिला देता है| संतों ने बार – बार कहा है जो है उसका उपयोग करो और जो नहीं है उसके बारे में सोच – सोच कर तनाव में मत आओ| हम जो नहीं हैं उसे हानि मन कर जो है उसका भी लाभ नहीं उठा पाते हैं| संतो के पास यह कला होती है की वह अभाव का भी आनंद उठा लेते हैं| हमारे लिये दो उदहारण काफी हैं| श्री राम वनवास में पूरी तरह से अभाव में थे| जिनका कल राजतिलक होने वाला था उन्हें चौदह वर्ष वनवास जाना पड़ा| इधर रावण के पास ऐसी सत्ता थी [...]

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‘ सफलता के नशे में माँ – बाप को मत भूलो ‘

 
राजा ज्ञानसेन के दरबार में प्रायः शास्त्रार्थ हुआ करता था| जो विजयी होता ज्ञानसेन उसे धन और मान से उपकृत करते| एक दिन ज्ञानसेन के दरबार में शास्त्रार्थ  चल रहा था| उस शास्त्रार्थ में विद्यवानभारवि विजेता घोषित किये गए| ज्ञानसेन ने उन्हें हाथी पर बिठाया और स्वयं चँवर डुलाते हुए उनके घर तक ले गए| भारवि जब ऐसे बड़े सम्मान के साथ घर पहुँचे तो उनके माता – पिता की ख़ुशी का ठिकाना न रहा|
घर लौट कर भारवि ने सर्व प्रथम अपनी माता को प्रणाम किया किन्तु पिता की ओर उपेक्षा भरा अभिवादन मात्र किया| माता को यह उचित नहीं लगा| उन्होंने भारवि को साष्टांग दंडवत के लिए इशारा किया| तो उन्होंने बड़े बेमन से इसका निर्वाह किया| पिता ने भी बेमन से चिरंजीवी रहो कह दिया| बात समाप्त हो गयी लेकिन माँ – बाप खिन्न बने रह गए| उन्हें वैसी प्रसन्नता नहीं थी जैसी होनी चहिए थी| कारण भी स्पष्ट था| किसी भी बड़ी उपलब्धि को अर्जित करने पर संतान जिस विनम्रता के भाव से माता पिता को नमन करती है उसका भारवि में सर्वथा अभाव था| उन्हें तो राजा के द्वारा हाथी पर बिठाकर चंवर डुलाते हुए घर तक लाने का अहंकार था| इस अहंकार में उन्होंने शिष्टाचार और विनम्रता को भुला दिया| थोड़े दिनों तक माता पिता की खिन्नता देखने के बाद भारवि माता से कारन पूछने गये| माता बोली विजय होकर लौटने के पीछे तुम्हारे पिता की कठोर साधना [...]

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‘ जीवन के चार सच ‘

 
ये हैं जीवन के चार सच:
किसी ने जीवन को सपना कहा है, तो किसी ने पहेली| किसी को लगता है की ज़िन्दगी में जो कुछ भी होना है, सब किस्मत के हाथ में है| दूसरी तरफ वे लोग हैं जो पुरुषार्थ यानि की मेहनत मशक्कत की भूमिका को अहम् मानते हैं|
जहाँ भाग्यवादी ज़िन्दगी की हर घटना के लिए भाग्य को ही ज़िम्मेदार ठहराते हैं, वहीँ कर्मवादियों को मानना है की व्यक्ति खुद ही अपने भाग्य का निर्माण करता है| इन अलग – अलग तरह की बातों को सुनकर एक आम इंसान दुविधा में पड़ जाता है, की आखिर ज़िन्दगी का असल सच क्या है? इसी दुविधा को मिटाने का काम किया है महात्मा बुद्ध ने – जिन्होंने इंसानी ज़िन्दगी के सच से पर्दा उठाते हुए बताया की ज़िन्दगी के चार ही सच हैं, जो की इस प्रकार हैं -
(१) इस संसार में दुःख अनिवार्य है, पूरी तरह से दुखों से मुक्ति संसार में रहते हुए संभव नहीं है|
(२) इस दुःख का एक कारण है, जिसे दूर करने से इन दुखों से छुटकारा पाया जा सकता है|
(३) दुखों का प्रमुख कारण इच्छा या वासनायें ही हैं|
(४) कभी पूरी न होने वाली इन इच्छाओं और वासनाओं को नष्ट करके ही इन दुखों को दूर किया जा सकता है|
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‘ गलती से भी बड़ी गलती है उस पर हँसना ‘

उन्नीसवी सदी की बात है, एक बार महारानी विक्टोरिया लन्दन में राजनयिक सम्मान समारोह में शामिल थी| समारोह के सम्मानीय अतिथि थे अफ्रीका के शासन प्रमुख| समारोह में करीब ५०० कूटनीतिज्ञ तथा राजशाही परिवार के सदस्य भाग ले रहे थे| सभी एक साथ भोजन करने बेठे| भोजन परोसे जाने के दोरान सब कुछ ठीक रहा लेकिन जब फिंगर बोल (हाथ धोने का पात्र) सभी के सामने रखा गया तो यह कइयो की फजीहत का कारन बन गया| अफ़्रीकी शासन प्रमुख ने इससे पूर्व कभी फिंगर बोल नहीं देखा था| वह परंपरा इंग्लैंड में बहुत प्रसिद्ध थी| अफ़्रीकी राजनयिक को किसी ने इसके बारे में समझाना जरूरी नहीं समझा था|
समारोह में मोजूद सभी विशेष अतिथियों को लगा की उन्हें इसकी जानकारी होगी| उस राजयनिक ने फिंगर बोल को कुछ श्रनों तक देखा तथा उसके बाद उसे अपने दोनों हाथों से पकड़कर उठाया| इससे पहले की कोई उनसे कुछ कह पाता| उन्होंने कटोरे को मुहँ से लगाया और उसमें रखे पानी को एक साँस में पी गए| यह देखकर सभी अति विशिष्ट अतिथि सन्न रह गये| कुछ श्रनों के लिए मेज पर सन्नाटा छाया रहा तथा उसके बाद सभी ने काना फूसी शुरू कर दी| सभी को व्याकुल देख महारानी विक्टोरिया ने भी फिंगर बोल को अपने दोनों हाथों में लिया और उसे मुहँ से लगा कर उसमे पड़े पानी को पी गयीं| महारानी को हाथ धोने वाला पानी पीते देख सभी लोग चकित रह गये [...]

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‘ नब्बे नहीं पूरे सौ चाहिए ‘

हम में से अधिकतर लोगों के साथ यही समस्या है | जेब में नब्बे रूपये हैं, तो उसका फायदा नहीं उठाएंगे | बस इसी प्रयास में लगे रहेंगे कि दस रूपये और मिल जाँय और पूरे सौ हो जाए | नब्बे रूपये का सुख नहीं भोगेंगे | दस रूपये का दुःख भोगेंगे | हम कभी अपने से छोटों को देखकर नहीं जीते हैं | हम सभी कम्पटीशन में जी रहें हैं, इसीलिए दुखी हैं | अगर पडौसी के घर में कार हो और हमारे घर में नहीं तो यह हमारे लिए सीधी चुनौती हो जाती है | इसलिए, जीवन में इतने दुःख , इतना संघर्ष और इतनी पीडाएं हैं | क्योंकि जीवन में केवल वही सुखी है जो दुःख में भी सुख खोजकर जीना जानता है|
एक बार की बात है – एक महात्मा के पास एक आदमी और उसकी पत्नी पहुंचे | बड़े परेशान, से और बुझे -बुझे से लग रहे थे | महात्मा जी ने उनसे उनकी परेशानी का कारण पुछा तो वे बोले मैं बहुत परेशान हूँ | मुझे बिजनेस में एक लाख का घाटा हुआ है | मन बड़ा बैचैन हो गया है | उसके पीछे उसकी पत्नी बैठी थी | वह धीरे से, मुस्करायी और बोली महाराज मेरे पति झूठ बोल रहे हैं | इनकी बातों में मत आना, इन्हें कोई घाटा नही हुआ | महात्मा ने कहा आखिर सच्चाई क्या है | तुम कहते हो घाटा , पत्नी कहती है कोई घाटा नही , सही क्या है ? वह आदमी बोला , मेरी पत्नी नही [...]

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सबसे बड़ा धन

एक भिखारी भूख – प्यास से त्रस्त होकर आत्महत्या की योजना बना रहा था , तभी वहां से एक नेत्रहीन महात्मा गुजरे | भिखारी ने उन्हें अपने मन की व्यथा सुनाई और कहा , ” मैं अपनी गरीबी से तंग आकर आत्महत्या करना चाहता हूँ |” उसकी बात सुन महात्मा हँसे और बोले , “ठीक है, आत्महत्या करो लेकिन पहले अपनी एक आंख मुझे दे दो | मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी चोंका | उसने कहा , “आप कैसी बात करते हैं | मैं आंख कैसे दे सकता हूँ |”
महात्मा बोले, “आंख न सही , एक हाथ ही दे दो , मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी असमंजस में पड़ गया | महात्मा मुस्कराते हुए बोले, संसार में सबसे बड़ा धन निरोगी काया है | तुम्हारे हाथ-पाव ठीक है, शारीर स्वस्थ है, तुमसे बड़ा धनी और कौन हो सकता है | तुमसे गरीब तो में हूँ कि मेरी आँखें नहीं हैं मगर में तो कभी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचता | भिखारी ने उनसे छमा मांगी और संकल्प किया कि वह कोई काम करके जीवन-यापन करेगा |
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भगवान बुद्ध की शिक्षा

एक बार भगवान बुद्ध के शिष्य आनंद ने उनसे पुछा , “प्रभु, उपदेश देते समय आप तो उच्च आसन पर बैठते है पर श्रोताओ को नीचे बैठना पड़ता है | क्या यह गुरु – शिष्य में भेद की स्थिति नहीं उत्तपन करता ?”  बुद्ध मुस्कराय फिर उन्होंने पुछा “क्या तुमने झरने का जल पिया है? ” आनंद ने कहा, “हाँ अनेक बार |”
बुद्ध बोले, “तुमने देखा होगा की जल सदैव ऊपर से नीचे की और गिरता है | पथिक को नीचे रह कर ही जल पीना पड़ता है| मान लो की तुम किसी पहाड़ी पर खड़े हो और वहां से बह रही किसी नदी का जल पीने की इच्छा करोगे तो क्या नदी तुम्हारी इच्छा पूरी करेगी ? नहीं न | वत्स, नीचे रहकर ही किसी वास्तु को प्राप्त किया जा सकता है |  ”
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“काम करने का ढंग”

एक संत अपने शिष्यों के साथ तीर्थ यात्रा पर निकले| रस्ते में निर्माणाधीन मंदिर पर कुछ मजदूर कार्य कर रहे थे| स्वामीजी ने एक मजदूर से पूछा – “भाई क्या कर रहे हो?” उसने उत्तर दिया के आपको दिखाई नहीं दे रहा है की हम गधे की तरह मजदूरी कर रहे है| ठेकेदार दम नहीं लेने देता |
दुसरे मजदूर से पूछने पर उसने कहा की महाराज | मंदिर बन रहा है| हमारी किस्मत में तो मजदूरी करनी लिखी है सो कर रहे है| थोड़ी ही दूर पर एक मजदूर सिर पर तगारी लिए चूना-पत्थर दौड-दौड़ कर पंहुचा रहा था| संत नर वही प्रश्न उससे दोहराया| उसने कहा की स्वामीजी हमारे धन्य भाग्य है| गाँव में मंदिर बन रहा है और मुझे भी यहाँ किस्मत से काम मिल गया है| भगवन की सेवा भी हो रही है तथा जीवन बसर भी हो रहा है|
संत ने शिष्यों को समझाया कि एक ही काम को एक व्यक्ति मजबूरी में तथा दूसरा व्यक्ति भाग्य को दोष देता हुआ एवं तीसरा व्यक्ति उत्साह से कर रहा है| यही काम उनकी गुणवत्ता में भी दिखाई देती है|
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