वह महानगर की सिर खपाऊ नौकरी में लगा हुआ था | एक – एक मिनट की कीमत उसके लिए बहुत थी | उसे तरक्की करनी थी | आगे जाना था | घर – परिवार के लिए सुख – सुविधाएँ जुटानी थी | आठ साल का उसका बेटा उससे कोई सवाल कर सके, ऐसे मौके कम ही आते थे | जब तक वह लौट कर आता, बेटा सो चुका होता था या सोने की तैयारी कर रहा होता था | पर उस दिन वह जगा हुआ था | दफ्तर से थका – मांदा लौटा पिता कपड़ें चेंज कर रहा था कि बेटा अचानक पूछ बैठा, पापा ! आपको एक घंटा काम करने के कितने रुपये मिलते है ? सवाल अजीब था | वह चिढ गया | इतने छोटे से बच्चे को इससे क्या मतलब है कि उसके पिता को एक घंटे के लिए क्यामिलता है ? उसने झिड़क दिया, फालतू बाते नहीं करते, जाओ सो जाओ | बेटा अपने कमरे में चला गया | हाथ मुहं धोकर थोड़ा फ्रेश होने पर उसने सोचा, बेकार ही झिड़क दिया | बच्चा है, हो सकता है मन में कोई सवाल उठा हो, हो सकता है बड़ा होकर वह उससे भी ज्यादा कमाने का सपना देख रहा हो | हो सकता है उसे अपने दोस्त के बीच डींग ही हांकनी हो | खाना खाने के बाद वह अपने बेटे के कमरे में गया | अभी वह सोया नहीं था | कोई कहानी पढ़ रहा था | उसने प्यार से बेटे के सिर पर हाथ फेरा और बोला,”क्यों पूछ रहे थे ?” बच्चों को अपने पापा से ऐसी बातें नहीं पूछनी चाहिए | तुम्हे खेलना – कूदना चाहिए मन लगा कर पढ़ना चाहिए | जानना चाहते हो तो बता देता हूँ – मुझे एक घंटे के लिए पांच सौ रुपये मिलते हैं | पिता ने यूँ ही एक अच्छी सी रकम बता दी | बेटा मुस्कराया, पर कोई जबाब नहीं दिया | पिता भी सोने चला गया | बात आई गई हो गई |
कुछ दिनों बाद पिता एक रोज फिर थका- मांदा घर लौटा | बेटा उस दिन भी जागा हुआ था | पिता को देखते ही उसने पूछा, पापा ! क्या मैं आपसे कुछ मांग सकता हूँ ? यह आसान था | दिन भर थकने के बाद घर लौटने पर यदि बच्चे की कोई छोटी – मोटी फरमाइश पूरी कर उसे खुश किया जा सके तो अच्छा ही है | उसने तपाक से कहा, हाँ – हाँ बोलो, क्यां चाहिए ? बेटे ने कहा, क्या आप मुझे तीन सौ रुपये दे सकते है? पिता के लिए यह मांग पूरी करना कोई मुस्किल नहीं था | फिर भी उसे गुस्सा आया | जेब खर्च से पूरा नहीं पड़ता क्या ? उसने झुझला कर जबाब दिया | बिलकुल नहीं | क्या करोगे इतने रूपयों का |अभी पिछले ही महीने मम्मी ने साईकिल दिलवाई है | पैसे पेड़ पर फलते हैं क्या ? बेटा रुआंसा होकर चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया | पिता रिलेक्स होने की कोशिश करने लगा | पर मन में हलचल थी | आखिर वह चाहता क्या है | क्या करेगा इतने पैसे का ? शायद प्यार से पूछना चाहिए कि क्यों मांग रहा है | खाना खाने के बाद वह फिर बेटे के कमरे में पंहुचा | बेटा वहां नहीं था | वह उसका बिस्तर ठीक करने लगा | अचानक तकिये केनीचे दस – दस पांच – पांच के कई नोट नजर आये | उसका माथा ठनका | ये कहाँ से आये ? बेटा कही चोरी करना तो नहीं सीख गया | उसने जोर से आवाज लगाई | बेटा कमरे में आया | उसने गुस्से में पूछा, ” ये रुपये कहा से आये ?” और इसके बावजूद तुम मुझसे तीन सौ रुपये मांग रहे थे ? वह भीतर से उबल रहा था | जब वह बोल चुका तो बेटे ने धीमे से कहा, पापा, जेबखर्च से बचा कर दो सौ रुपये जमा कर लिए हैं | अगर तुम मुझे तीन सौ रुपये दे देते, तो कुल पांच सौ हो जाते | आपको दफ्तर वाले एक घंटे के इतने ही देते है ना | तो उसके बदले में आपको पांच सौ रुपये दे देता और आप उस दिन एक घंटे जल्दी घर आ जाते | पापा, मैं एक दिन आपके साथ डिनर करना चाहता हूँ | बेटे कि बात सुनकर उसकी आँखों में आंसू आ गए | आर्थिक लक्ष्य का संधान करते – करते, हम अक्सर उन्हीं रिश्तों को हासिये पर डाल देते हैं जो हमें सबसे प्रिय होते हैं |
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excellent story aaj ki busy life me hum aksar apno ko bhul jate hain
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veru very intresting story……….
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